अलार्म बज चुका है: क्या आने वाली पीढ़ी को सिर्फ किताबों में दिखेंगे जंगल?

बढ़ती गर्मी और सूखती नदियाँ दे रहीं चेतावनी, अब जागने का समय

सत्यम कुमार मद्धेशिया

 पीपीगंज/पूर्वांचल

बढ़ती गर्मी, बेमौसम बारिश और लगातार सूखती नदियाँ अब केवल खबरों की सुर्खियां नहीं रहीं, बल्कि प्रकृति की स्पष्ट चेतावनी बन चुकी हैं। विकास की अंधी दौड़ में इंसान इतना आगे निकल गया है कि वह उसी धरती को भूल बैठा है जिसने उसे जीवन दिया। सवाल यह है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को केवल किताबों और तस्वीरों में ही हरे-भरे जंगल दिखाएंगे?

विशेषज्ञों के अनुसार एक औसत व्यक्ति को प्रतिदिन जितनी ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, उसके लिए कम से कम 7-8 पेड़ों का होना जरूरी है। ऐसे में हर नागरिक को यह सोचना होगा कि उसने अपने हिस्से के पेड़ लगाए हैं या नहीं। शहरों और कस्बों में कंक्रीट का विस्तार तेजी से हो रहा है, जिससे हरियाली सिमटती जा रही है। परिणामस्वरूप परिंदों का बसेरा खत्म हो रहा है और सुबह की शुरुआत चहचहाहट के बजाय वाहनों के शोर से हो रही है।

 

 

हर वर्ष तापमान नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है। अगर समय रहते हरियाली नहीं बढ़ाई गई, तो भविष्य के तथाकथित “स्मार्ट सिटी” भी रहने योग्य नहीं रहेंगे। पर्यावरणविदों का मानना है कि हालात को सुधारने के लिए बड़े अभियानों से पहले छोटे-छोटे व्यक्तिगत प्रयास जरूरी हैं।

क्या कर सकते हैं हम?

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को अपनी दिनचर्या से हटाना, जल संरक्षण को आदत बनाना और जन्मदिन या विशेष अवसरों पर पौधे भेंट करना जैसे छोटे कदम बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं। स्थानीय स्तर पर खाली पड़ी जमीनों को ‘मिनी फॉरेस्ट’ में बदलने की पहल भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जागरूकता केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पीपीगंज से लेकर पूरे पूर्वांचल तक हर नागरिक को यह समझना होगा कि जब आखिरी पेड़ कटेगा और आखिरी नदी सूखेगी, तब पैसे से जीवन नहीं खरीदा जा सकेगा।

आज का संदेश:

“प्रकृति माता है, बाजार नहीं। इसकी रक्षा करें, ताकि यह हमारी रक्षा कर सके।”

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