चीन की राजनीति के बीच नेपाल को भुगतना पड़ रहा दैवीय बाढ़ व अन्य आपदाओं का खामियाजा

पूर्व सांसद कुंवर अखिलेश सिंह और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी काठमांडू का बड़ा बयान—‘चीन की साम्राज्यवादी नीति से नेपाल परेशान’; हिमालय बना बड़ा रिस्क जोन, भारत-नेपाल के बीच मुक्त व्यापार की वकालत

सोनौली,नेपाल/काठमांडू। नेपाल में हालिया बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के बीच चीन की भूमिका तथा भारत-नेपाल संबंधों को लेकर पूर्व सांसद कुंवर अखिलेश सिंह और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी काठमांडू ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं।

दोनों ने कहा कि चीन की राजनीति और उसकी कथित साम्राज्यवादी नीतियों के बीच नेपाल को लगातार संकटों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, प्राकृतिक आपदाओं के पीछे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को भी उन्होंने बड़ा कारण बताया।

‘चीन की साम्राज्यवादी नीति से नेपाल परेशान’

दिनेश त्रिपाठी काठमांडू ने कहा कि चीन लंबे समय से अपनी साम्राज्यवादी नीति पर आगे बढ़ रहा है और इसका प्रभाव नेपाल समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है। उनके अनुसार, तिब्बत से जुड़े सवाल का स्थायी समाधान नहीं होने तक क्षेत्र में चीन की नीतियों का प्रभाव बना रह सकता है।

 

 

उन्होंने भारत की नीति की तुलना चीन से करते हुए कहा कि भारत ने कभी नेपाल पर कब्जे की साम्राज्यवादी नीति नहीं अपनाई। चाहे केंद्र में भाजपा की सरकार रही हो या कांग्रेस की, भारत ने नेपाल की संप्रभुता का सम्मान किया है।

उन्होंने नेपाल की जनता को आश्वस्त करते हुए कहा कि भारत कभी नेपाल पर कब्जा नहीं करेगा।

भारत-नेपाल के बीच मुक्त व्यापार की वकालत

भारत और नेपाल के सदियों पुराने सामाजिक एवं सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने दोनों देशों के बीच खुली सीमा व्यवस्था को महत्वपूर्ण बताया।

दिनेश त्रिपाठी काठमांडू ने कहा कि दोनों देशों के बीच पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ते बेहद पुराने हैं। नेपाली नागरिक लंबे समय से भारतीय सेना में भी सेवा देते रहे हैं।

उन्होंने भारत और नेपाल के बीच मुक्त व्यापार व्यवस्था को और मजबूत करने की वकालत की। उनका कहना था कि भारत में उत्पादित वस्तुओं को नेपाल के बाजार तक आसानी से पहुंच मिलनी चाहिए और नेपाल में उत्पादित वस्तुओं के लिए भी भारतीय बाजार अधिक खुला होना चाहिए।

हिमालय बना ‘टाइम बम’, हजारों हिमताल खतरे में

कुंवर अखिलेश सिंह और दिनेश त्रिपाठी काठमांडू ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरे पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पूरे हिमालय में बड़ी संख्या में हिमताल और ग्लेशियर मौजूद हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ रहा है और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कई हिमताल अस्थिर स्थिति में हैं और इनके टूटने से बहुत बड़ी तबाही हो सकती है। पूरा हिमालयी क्षेत्र अब एक बड़े ‘रिस्क जोन’ में बदल चुका है और इसे एक तरह का ‘टाइम बम’ कहा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि इस खतरे से निपटने के लिए अत्याधुनिक तकनीक, विशेषज्ञता, निगरानी प्रणाली और बड़े स्तर की आपदा-प्रबंधन तैयारी की आवश्यकता है।

रेस्क्यू में देरी पर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल

आपदा के दौरान सुरंग में फंसे लोगों के बचाव अभियान का उल्लेख करते हुए दिनेश त्रिपाठी काठमांडू ने सरकार की तैयारियों पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में भारत, चीन और अन्य देशों ने मदद की पेशकश की थी, लेकिन तत्काल सहायता स्वीकार नहीं की गई। काफी समय गुजरने के बाद सहायता स्वीकार किए जाने को उन्होंने सरकार की अपरिपक्वता का संकेत बताया।

उन्होंने कहा कि मानवीय संकट किसी एक देश या सरकार का मुद्दा नहीं होता। ऐसे समय में दुनिया के सभी देशों और संस्थाओं से मिलने वाली सहायता को स्वीकार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा—“हर एक जीवन महत्वपूर्ण है और हर व्यक्ति का जीवन मूल्यवान है।” इसलिए आपदा के समय लोगों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए।

राहत सामग्री रोकने पर भी उठाए सवाल

भारत की निजी संस्थाओं द्वारा नेपाल भेजी जा रही राहत सामग्री को सीमा पर रोके जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि ऐसी मानवीय सहायता को नहीं रोका जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संकट की घड़ी में लोग मानवीय भावना से स्वतः सहायता के लिए आगे आ रहे हैं। ऐसे में सरकार को उनका सहयोग लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नेपाल में दवाइयों, खाद्यान्न और आवश्यक उपकरणों की जरूरत है। ऐसे समय में हर संभव मानवीय सहायता को तेजी से प्रभावित लोगों तक पहुंचाना प्राथमिकता होनी चाहिए।

‘संकट किसी एक देश का नहीं, पूरे हिमालय क्षेत्र का’

कुंवर अखिलेश सिंह और दिनेश त्रिपाठी काठमांडू ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल नेपाल की समस्या मानने के बजाय इसे पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी बताया।

उनके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना और हिमतालों के अस्थिर होने का खतरा आने वाले समय में और गंभीर हो सकता है। इसलिए भारत, नेपाल समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र को आधुनिक तकनीक, बेहतर निगरानी और साझा आपदा-प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीरता से काम करना होगा।

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