नेपाल संसद में PM बालेन शाह का बड़ा बयान 

भारत ही नहीं, नेपाल ने भी कई जगह भारतीय जमीन पर किया है अतिक्रमण

बयान से मचा राजनीतिक तूफान, विदेश मंत्रालय ने दी सफाई

सीमा विवाद को बातचीत से सुलझाने पर जोर

मनोज कुमार त्रिपाठी 

काठमांडू! नेपाल के प्रधानमंत्री एवं काठमांडू महानगर के पूर्व मेयर Balen Shah के संसद में दिए गए एक बयान ने नेपाल और भारत दोनों देशों में राजनीतिक बहस छेड़ दी है। संसद में अपने पहले संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद यह जानकारी मिली कि “सिर्फ भारत ने ही नेपाल की भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया हुआ है।

प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद संसद में मौजूद सांसदों के बीच हलचल मच गई और सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से वायरल हो गया। शाह ने कहा कि दोनों देशों के बीच सीमा संबंधी विवादों को टकराव के बजाय मित्रवत बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाया जाना चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र के विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि नेपाल ने इस विषय पर भारत को आधिकारिक कूटनीतिक नोट भेजा है और दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया जारी है। शाह के अनुसार सीमा विवाद के समाधान के लिए इतिहासकारों और सीमा विशेषज्ञों की मदद लेने पर भी सहमति बनी है।

हालांकि उनके बयान के कुछ ही समय बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी किया। मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी का आशय यह नहीं था कि नेपाल ने जानबूझकर भारतीय भूमि पर कब्जा किया है। मंत्रालय के अनुसार, बदलती नदी सीमाओं और तकनीकी सीमा निर्धारण से जुड़े कुछ क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा खेती और भूमि उपयोग की स्थिति उत्पन्न हुई है, उसी संदर्भ में यह टिप्पणी की गई थी।

भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा तथा सुस्ता क्षेत्र को लेकर लंबे समय से सीमा विवाद बना हुआ है। वर्ष 2020 में भारत द्वारा उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख तक सड़क निर्माण के बाद विवाद और गहरा गया था। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने हिस्से के रूप में दर्शाया था।

भारत लगातार नेपाल के दावों को खारिज करता रहा है और नई दिल्ली का कहना है कि सीमा संबंधी उसका रुख स्पष्ट और स्थिर है। वहीं नेपाल सरकार का कहना है कि सभी विवादों का समाधान शांतिपूर्ण वार्ता और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए किया जाएगा।

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