मनोज कुमार त्रिपाठी
गोरखपुर-महराजगंज! गन्ने से एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति के बीच गोरखपुर-महराजगंज में इसके फायदे और नुकसान को लेकर चर्चा तेज हो गई है। गोरखपुर के पिपराइच चीनी मिल में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की तैयारी है, जबकि महराजगंज में इस वर्ष गन्ने का रकबा करीब 20 हजार हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष के करीब 20,400 हेक्टेयर से कम है।
इसी बीच अरविंद केजरीवाल ने एथेनॉल नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि गन्ने का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में बढ़ने से चीनी के लिए उपलब्ध गन्ना प्रभावित हुआ और इसका असर चीनी की कीमतों पर पड़ा। गोरखपुर में चीनी का स्थानीय भाव ₹75 प्रति किलो तक पहुंचने की बात भी सामने आ रही है।
हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि चीनी की कीमतों में तेजी के लिए केवल एथेनॉल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सरकार के अनुसार उत्पादन में कमी, खराब मौसम और फसल को हुए नुकसान जैसे कारण भी महत्वपूर्ण हैं।
फायदा: एथेनॉल से पेट्रोल में घरेलू जैव ईंधन का मिश्रण बढ़ता है, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और चीनी मिलों व किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार और आय का रास्ता बन सकता है।
नुकसान: यदि गन्ने का अधिक हिस्सा एथेनॉल की ओर जाता है तो चीनी का उत्पादन प्रभावित होने पर बाजार में कीमत बढ़ने का दबाव बन सकता है। यही वजह है कि गन्ने से चीनी और एथेनॉल के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
पूर्वांचल के लिए असली चुनौती यही है कि किसान को बेहतर दाम मिले, मिलों को लाभ हो, एथेनॉल का लक्ष्य पूरा हो और आम आदमी को महंगी चीनी का बोझ न उठाना पड़े।

