उमेश चन्द्र त्रिपाठी
ऐसी सियासत भी होती थी, जहां सत्ता से ज्यादा सादगी का कद बड़ा होता था… जहाँ कुर्सी नहीं, किरदार पहचान बनता था और उसी पहचान का नाम था श्रीपति मिश्रा। आज की तेज़ रफ्तार राजनीति में उनका नाम एक शांत, संतुलित और सिद्धांतवादी दौर की याद दिलाता है।
श्रीपति मिश्रा का जन्म 20 जनवरी 1924 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के शेषपुर गांव में हुआ।
साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने शिक्षा के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने काशी से एम.ए. और लखनऊ विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की, जिसके बाद उन्होंने वकालत और न्यायिक सेवा से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की।
1962 में पहली बार कादीपुर (सुल्तानपुर) से विधायक चुने गए और यहीं से राजनीतिक सफर शुरू हुआ।
1967 में दोबारा विधायक बने और अपनी कार्यशैली से तेजी से पहचान बनाई। उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा का उपाध्यक्ष (1967-1968) भी बनाया गया,
जहां उन्होंने निष्पक्ष और संतुलित नेतृत्व का परिचय दिया।
1969-70 में पहली बार लोकसभा सांसद बने और राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा। इसके बाद 1970-71 में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बने, जहां उन्होंने खाद्य, रसद, शिक्षा और श्रम जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले।
उनकी कार्यशैली हमेशा प्रशासनिक संतुलन और जनहित पर केंद्रित रही।
1976 में राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने और विकास योजनाओं में योगदान दिया। 1980 में तीसरी बार विधायक बने और उसी वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष बने। उनका अध्यक्ष कार्यकाल (1980-1982) निष्पक्षता और अनुशासन के लिए जाना जाता है, जहां उन्होंने सदन की गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
1982 में वी.पी. सिंह के इस्तीफे के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। 1982 से 1984 तक उन्होंने 13वें मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने प्रशासनिक संतुलन और संगठन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। उनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन प्रभावशाली और अनुशासित रहा।
1984 में दूसरी बार लोकसभा सांसद बने और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे। 1989 के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली, लेकिन उनका व्यक्तित्व हमेशा सादगी और ईमानदारी की मिसाल बना रहा। 7 दिसंबर 2002 को लखनऊ में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।


