उमेश चन्द्र त्रिपाठी
काठमांडू! डॉ बाबूराम भट्टराई के अनुसार आज से ठीक 12 साल पहले, यानी 2070 चैत्र में मेरा लेख “नेपाल वीकली” उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। उस समय देश में संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी। मैं तब माओवादी पार्टी की शीर्ष नेतृत्व पंक्ति में था।
मैंने उस समय देश और दुनिया की परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला था कि देश को अब नई सोच, नई नीति, नए कार्यक्रम और पुराने दलों व पुराने नेतृत्व के विकल्प की जरूरत है, ताकि नए युग की नई जिम्मेदारियों को पूरा किया जा सके।
आज नवोदित दल रास्वापा की ओर से नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री श्री बालेन्द्र शाह को उनके शपथ ग्रहण समारोह के बाद बधाई देते समय उस लेख की याद मेरे मन में फिर से ताज़ा हो गई।
और इसी के साथ कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध रचना “द एटीन्थ ब्रूमेयर ऑफ लुई बोनापार्ट” की यह पंक्ति भी याद आई—
> “लोग अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं, लेकिन अपनी इच्छा के अनुसार नहीं; वे उन परिस्थितियों में इतिहास बनाते हैं जिन्हें उन्होंने स्वयं नहीं चुना होता, बल्कि जो उन्हें अतीत से मिली होती हैं और जो उनके सामने मौजूद होती हैं।”