कभी यूपी की सियासत में बोलती थी तूती, प्यार और कत्ल ने बदल दी जिंदगी?
सार
अमर मणि त्रिपाठी का नाम यूपी के बाहुबली नेताओं में सुमार है। यूपी की राजनीति में वो कभी सपा तो कभी बसपा और कमल के फूल के साथ रहकर सत्ता का सुख भोगते रहे और आज भी पिता-पुत्र सत्ता की चाह में एड़ी-चोटी लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। 30 जुलाई 2026 को नौतनवां में केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा एक निजी अस्पताल के उद्घाटन के कार्यक्रम में अमर मणि त्रिपाठी के समर्थकों की एंट्री आखिर किस ओर इशारा कर रही है?
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
महराजगंज! पूर्व मंत्री और यूपी के चर्चित कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में सजायाफ्ता पूर्वांचल के बाहुबली अमर मणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि को बीते 25 अगस्त 2023 को जेल से रिहा कर दिया गया। हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे अमर मणि के अच्छे आचरण के चलते समय से पहले रिहाई का आदेश जारी हुआ था। अमर मणि त्रिपाठी 20 साल बाद सपत्नीक जेल की सलाखों से बाहर आ गए हैं , लेकिन एक वक्त था जब यूपी में उनके नाम की तूती बोलती थी।
अमर मणि त्रिपाठी का नाम यूपी के बाहुबली नेताओं में सुमार है। एक समय था जब पूर्वी यूपी में उनका खासा रसूख था। यूपी की राजनीति में वो कभी सपा तो कभी बसपा और कमल के फूल के साथ रहकर सत्ता का सुख भोगते रहे, लेकिन मधुमिता हत्याकांड के बाद उनकी सितारे गर्दिश में चले गए थे।
बाहुबली नेताओं में शुमार रहे अमर मणि
अमर मणि त्रिपाठी ने अपनी राजनीति की शुरुआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से की, लेकिन इसके बाद वो कांग्रेस के साथ आ गए। उन्होंने कांग्रेस के बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी को अपना राजनीतिक गुरू बनाया और उनसे राजनीति के गुर सीखे। राजनीति में आने से पहले ही वो अपराध की दुनिया में एंट्री कर चुके थे। उनपर हत्या, लूट और मारपीट जैसे कई मामले दर्ज थे। कुछ ही समय में अमर मणि त्रिपाठी ने पूरे इलाके पर दबदबा कायम कर लिया।
अमर मणि त्रिपाठी ने साल 1981 में पहली बार महाराजगंज जिले की 190 लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस और कम्युनिस्ट गठबंधन के टिकट से चुनाव लड़ा और उस वक्त के एक और बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही से चुनाव हार गए। पुनः 1984 के चुनाव में अमर मणि त्रिपाठी दुबारा वीरेंद्र प्रताप शाही से चुनाव हार गए। कारण था नौतनवां निवासी सरदार अजीत सिंह की हत्या?
साल 1989 में पहली बार अमर मणि त्रिपाठी ने जीत का स्वाद चखा और वीरेन्द्र प्रताप शाही के दाहिने हाथ रहे कुंवर अखिलेश सिंह को बुरी तरह हरा दिया। इसके बाद 1991 और 1993 में हुए चुनाव में कुंवर अखिलेश सिंह ने अमर मणि त्रिपाठी को लगातार दो बार चुनाव हरा दिया। लेकिन जीवट का यह बाहुबली नेता 1996,2002,2007 लगातार तीन बार इस सीट से विधायक चुन लिया गया। अमर मणि त्रिपाठी ने 1996 में कुंवर अखिलेश सिंह को और 2002 तथा 2007 में कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह को हराया था। 2007 में अमर मणि त्रिपाठी जेल में रहकर चुनाव जीते थे। लेकिन 2012 में उन्होंने अपने पुत्र अमन मणि त्रिपाठी को चुनाव लड़ाया पर वह सपा छोड़कर कांग्रेस में गये कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह से चुनाव हार गए। चुनाव में मुन्ना सिंह के जीत का एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि मंचों से उन्होंने नौतनवां विधान सभा की जनता का आवाहन किया कि आप लगातार हमें बाप से तो हराते रहे क्या अब बेटे से भी हराएंगे जनता ने उनके इस हृदय विदारक अपील को आत्मसात करते हुए उन्हें पहली बार विधायक चुन लिया। लेकिन 2017 के चुनाव में अमर मणि त्रिपाठी जेल में रहते हुए भी अमन मणि त्रिपाठी को नौतनवां विधान सभा की सीट पर बीस हजार के भारी मतों के अंतर से मुन्ना सिंह को हराने में कामयाब हो गए।
हालांकि उस समय अमन मणि त्रिपाठी अपनी पत्नी सारा सिंह की हत्या के आरोप में जेल में बंद थे और वह जेल में रहकर चुनाव लड़े थे। उस समय उनकी दोनों बहनों तनुश्री मणि और अलंकृता मणि ने चुनाव की कमान संभाली थी और उन्होंने जनता के बीच जाकर एक भावुक अपील करते हुए कहा था कि मेरे पास पिता, मां और भाई इस समय जेल में बंद हैं,हम लोग पूरी तरह से अनाथ हो गए हैं अब आप लोग हमारे माता-पिता और भाई हैं उनके इस मार्मिक अपील को जनता ने आत्मसात किया और अमन मणि त्रिपाठी को भारी मतों से जीत दिलाई।
साल 2022 में निषाद-भाजपा गठबंधन प्रत्याशी ऋषि त्रिपाठी ने नब्बे हजार वोट पाकर कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह को बारह हजार मतों के भारी अंतर से हराया और पहली बार विधायक बने। इस चुनाव में अमन मणि त्रिपाठी तीसरे स्थान पर रहे।
बता दें कि 1997 में अमर मणि त्रिपाठी कांग्रेस को छोड़कर लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और फिर कल्याण सिंह की सरकार में मंत्री बन गए। साल 2001 में बस्ती के एक बिजनेसमैन के बेटे राहुल मद्धेशिया के अपहरण मामले में उनका नाम आया तो बीजेपी ने उनसे किनारा कर लिया।
हर राजनीतिक दल से साथ भोगा सत्ता सुख
इसके बाद 2002 में अमर मणि त्रिपाठी बसपा के साथ आ गए और उन्हें नौतनवां सीट से ही फिर टिकट मिल गया और इस सीट पर ज्यादातर ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या होने का उन्हें फायदा मिला और वो चुनाव जीत गए। 2002 में मायावती की सरकार बनाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई लेकिन 2003 में वो समाजवादी पार्टी के साथ आ गए और मायावती की सरकार गिरवा दी। माना जाता है कि इसमें अमर मणि का हाथ था। इसके बाद राज्य में मुलायम सिंह सरकार बना और उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
मधुमिता हत्याकांड से मचा भूचाल
साल 2003 में कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के बाद उनके जीवन में ऐसा भूचाल आया कि वो उससे उबर नहीं सके। मधुमिता की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जांच में पता चला कि वो उस समय गर्भवती थी। डीएनए जांच में बच्चे के पिता के तौर पर अमर मणि त्रिपाठी का नाम आया। साल 2007 में उन्हें इस मामले में दोषी पाया गया और अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। जेल में रहकर उन्होंने अपने बेटे अमन मणि त्रिपाठी को भी विधायक बनाया। कई बार उन पर जेल से ज्यादा अस्पताल में समय बिताने का आरोप भी लगा था।