नेपाल सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘100 रुपये भंसार’ नियम पर रोक, बालेन सरकार को झटका

“सरकार के फैसले हो रहे फेल” — सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने बालेन सरकार पर उठाए सवाल

(नेपाल संविधान के आधार पर विशेष रिपोर्ट)

 

मनोज कुमार त्रिपाठी

 

नेपाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीमा पार खरीदारी पर लगाए गए ‘100 रुपये भंसार’ नियम पर रोक लगाए जाने के बाद देशभर में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। इस पूरे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने बालेन सरकार के निर्णयों पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे नेपाल संविधान की भावना के खिलाफ बताया।

 

सोनौली बॉर्डर पर मीडिया से बातचीत करते हुए अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि नेपाल संविधान 2015 के अनुसार प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन, समानता और स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में 100 रुपये जैसी सीमा तय कर सीमा क्षेत्र के लोगों पर रोक लगाना संविधान की मूल भावना को कमजोर करता है।

 

उन्होंने कहा कि नेपाल संविधान की धारा 16 के अंतर्गत नागरिकों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है, जबकि धारा 18 में समानता का अधिकार स्पष्ट रूप से दिया गया है। सरकार द्वारा लगाया गया यह नियम सीमावर्ती क्षेत्र के आम नागरिकों के जीवन-यापन और दैनिक जरूरतों पर सीधा प्रभाव डालता है, जिससे उनके अधिकारों का हनन होता है।

 

अधिवक्ता त्रिपाठी ने कहा—

“100 रुपये में तो आज के समय में सामान्य जरूरत का सामान भी नहीं आ सकता। सीमावर्ती इलाकों में दशकों से cross-border shopping एक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा रही है। नेपाल और भारत दोनों देशों के नागरिक एक-दूसरे के बाजारों में खरीदारी करते रहे हैं। इसे रोकना न केवल अव्यवहारिक है बल्कि संविधान के खिलाफ भी है।”

 

उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह माना है कि यह फैसला तर्कहीन और अनुचित है, इसलिए न्यायालय ने फिलहाल इस नियम पर stay order जारी किया है। कोर्ट का मानना है कि इस प्रकार की पाबंदी आम नागरिकों की गरिमा (dignity) और समान अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

 

बालेन सरकार पर निशाना साधते हुए अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि सरकार द्वारा लिए जा रहे कई फैसले लगातार न्यायालय में टिक नहीं पा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रेड यूनियन और विद्यार्थी संगठनों पर लगाए गए प्रतिबंधों के मामलों में भी अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके साथ ही सुकुम्बासी बस्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई जैसे मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाई जा चुकी है।

 

उन्होंने कहा—

“सरकार को संविधान के दायरे में रहकर निर्णय लेने चाहिए। बार-बार अदालत से रोक लगना यह दिखाता है कि सरकार के फैसले कानूनी कसौटी पर कमजोर साबित हो रहे हैं।”

 

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