प्रशासक नियुक्ति का विरोध, बोले— “लोकतंत्र की निरंतरता के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही मिले जिम्मेदारी”
मनोज कुमार त्रिपाठी
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल आगामी 26 मई 2026 एवं 19 जुलाई 2026 को समाप्त होने जा रहा है। इसी बीच पंचायत चुनाव समय पर न हो पाने की आशंका को देखते हुए अखिल भारतीय प्रधान संगठन ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर पंचायत प्रतिनिधियों के कार्यकाल को बढ़ाने की मांग की है।
संगठन की ओर से कहा गया है कि वर्तमान स्थिति में मतदाता सूची पुनरीक्षण में देरी, समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन लंबित होना तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित “ट्रिपल टेस्ट” की प्रक्रिया पूरी न होना जैसे कारणों से तय समय पर पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं दिख रहा है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि चुनाव न होने की स्थिति में पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए जाते हैं, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान होगा। संगठन का कहना है कि पहले भी प्रशासकों की नियुक्ति के दौरान कई क्षेत्रों में पारदर्शिता की कमी, जवाबदेही का अभाव और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं, जिससे ग्रामीण जनता का भरोसा कमजोर हुआ।
संगठन ने यह तर्क दिया कि ग्राम प्रधान एवं पंचायत प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि होते हैं, जो सीधे जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। ऐसे में विकास कार्यों की निरंतरता और सुशासन बनाए रखने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही कार्यभार सौंपना अधिक उचित है।
संगठन ने यह भी बताया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे राज्यों में समान परिस्थितियों में निर्वाचित प्रतिनिधियों को कार्यभार देकर लोकतांत्रिक व्यवस्था की निरंतरता बनाए रखने के उदाहरण मौजूद हैं।
प्रधान संगठन ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि प्रदेश के लाखों पंचायत प्रतिनिधियों और करोड़ों ग्रामीण नागरिकों की अपेक्षाओं को देखते हुए त्रिस्तरीय पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल बढ़ाने पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लिया जाए।