30 साल बाद कांग्रेस में पुनः जाने की बड़े जोर शोर से चर्चा, विरोधी खेमे में खलबली
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
महराजगंज! उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘बाहुबली नेता’ चार बार के विधायक व पूर्व मंत्री अमर मणि त्रिपाठी पूर्वांचल की सियासत का एक बड़ा नाम हैं। कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काटकर जेल से बाहर आए पूर्व मंत्री अमर मणि त्रिपाठी इन दिनों सियासी चर्चा के केंद्र में हैं। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले त्रिपाठी परिवार कांग्रेस का हाथ थाम सकता है। ऐसे में उनकी ‘घर वापसी’ के कयास लगाए जाने लगे हैं।

अमरमणि की कांग्रेस नेताओं से मुलाकात
कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अभिषेक दत्त पूर्वांचल क्षेत्र के प्रभारी हैं। अभिषेक दत्त और कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत बीते 30 अगस्त 2026 को पूर्वांचल के संगठनात्मक दौरे पर पहुंचे थे। उनके स्वागत के लिए गोरखपुर एयरपोर्ट पर कांग्रेस नेताओं के साथ अमरमणि त्रिपाठी भी पहुंचे। इसके बाद महराजगंज में आयोजित कांग्रेस की बैठक में भी पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी मौजूद रहे।

अभिषेक दत्त और सुप्रिया श्रीनेत से मुलाकात तथा कांग्रेस की बैठक में शिरकत करने के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि अमर मणि त्रिपाठी अपनी पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस में वापसी की जमीन तैयार कर रहे हैं। उनके बेटे और पूर्व विधायक अमन मणि त्रिपाठी पहले ही मार्च 2024 में कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। उल्लेखनीय है कि अमर मणि त्रिपाठी ने अपनी सियासी पारी का आगाज भी कांग्रेस से ही किया था।
अमर मणि त्रिपाठी क्या करेंगे घर वापसी?
पिछले दिनों अमर मणि त्रिपाठी ने 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया था

महराजगंज जिले की फरेंदा सीट से अमर मणि त्रिपाठी ने खुद और नौतनवां सीट से अपने बेटे अमन मणि के चुनाव लड़ने की बात कही थी। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा था, ‘अगर कोई मुकाबले का हो तो बताओ?’
1989 में अमर मणि त्रिपाठी पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे, लेकिन 1991 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। फिर 1993 में भी वह चुनाव हार गए। दोनों भार कुंवर अखिलेश सिंह ने उन्हें हरा दिया था।इसके बाद लगातार तीन चुनावों-1996, 2002 और 2007 में अमर मणि त्रिपाठी ने कांग्रेस, बसपा और सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत की हैट्रिक लगाई। इसके बाद 2017 में उनके बेटे अमन मणि भी चुनाव जीते, लेकिन 2022 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अमन मणि त्रिपाठी को 2022 के चुनाव में निषाद पार्टी और भाजपा गठबंधन के टिकट पर लड़े ऋषि त्रिपाठी ने उन्हें तीसरे नंबर पर धकेल दिया और विजयी हुए। इस चुनाव में कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह दूसरे स्थान पर रहे।

बता दें कि महराजगंज का इलाका अमर मणि त्रिपाठी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। अमर मणि त्रिपाठी ने जिस तरह से महराजगंज से चुनाव लड़ने की घोषणा की है, तभी से यह चर्चा चल रही है कि वे किस पार्टी का दामन थामेंगे। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अभिषेक दत्त और सुप्रिया श्रीनेत का स्वागत करने के बाद बैठक में शामिल होना इस बात का संकेत है कि उनकी कांग्रेस के साथ बातचीत अंतिम दौर में है। सुप्रिया श्रीनेत महराजगंज के पूर्व सांसद (हर्षवर्धन) की बेटी हैं और कांग्रेस नेतृत्व में उनका अच्छा खासा दखल है लेकिन अमर मणि त्रिपाठी से उनके रिश्ते ठीक नहीं बताए जा रहे हैं ऐसे में माना जा रहा है कि अमर मणि को कांग्रेस से टिकट लेने में नाकों चने चबाना पड़ सकता है? अमर मणि त्रिपाठी के कांग्रेस में जाने को लेकर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष विजय सिंह एडवोकेट कहते हैं अमन मणि और अमरमणि दोनों अभी तक कांग्रेस के सदस्य नहीं हैं। जहां तक उन्हें कांग्रेस का टिकट मिलने की चर्चा है यह पूरी तरह गलत है। पार्टी नेतृत्व से जिले की कमेटी ने इन दोनों को पार्टी में शामिल न करने का अनुरोध पहले ही कर दिया है।

कांग्रेस के सामने सियासी धर्मसंकट
अमर मणि त्रिपाठी की कांग्रेस में एंट्री पूरी तरह पक्की होती है, तो पार्टी के भीतर कई स्थानीय समीकरण प्रभावित हो सकते हैं, फरेंदा सीट पर वर्तमान में कांग्रेस का कब्जा है। गोरखपुर-बस्ती मंडल में कांग्रेस के इकलौते मौजूदा विधायक वीरेंद्र चौधरी फरेंदा सीट से ही आते हैं। ऐसे में वीरेंद्र चौधरी की जगह अमर मणि त्रिपाठी को टिकट देना कांग्रेस के लिए आसान फैसला नहीं होगा। दूसरी तरफ, नौतनवां सीट पर समाजवादी पार्टी का जनाधार काफी मजबूत माना जाता है यदि 2027 में सपा-कांग्रेस का ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन बरकरार रहता है, तो नौतनवां सीट कांग्रेस के खाते में आने के बाद ही अमन मणि को टिकट मिल सकता है।

वहीं, कानूनविदों का कहना है कि सजायाफ्ता होने की वजह से अमर मणि त्रिपाठी के खुद चुनाव लड़ने पर कानूनी पेंच फंस सकता है, क्योंकि उन्हें अच्छे आचरण के आधार पर वक्त से पहले रिहा तो किया गया है, लेकिन उनकी सजा माफ नहीं हुई है। ऐसे में फरेंदा सीट कांग्रेस के वर्तमान विधायक वीरेंद्र चौधरी के पास ही रह सकती है।
बाहुबल और ब्राह्मण राजनीति’ की वापसी
पूर्वांचल में ब्राह्मण राजनीति का एक दौर पंडित हरिशंकर तिवारी और अमर मणि त्रिपाठी के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। अमर मणि त्रिपाठी का खुद चुनावी मैदान में आना महराजगंज क्षेत्र में परंपरागत ‘ब्राह्मण बनाम ठाकुर’ या जातीय ध्रुवीकरण के समीकरण को फिर से हवा दे सकता है। महराजगंज जनपद गोरखपुर और बस्ती मंडल के ब्राह्मण मतदाता अमर मणि त्रिपाठी के पारिवारिक राजनीतिक रसूख से सीधे प्रभावित होते रहे हैं।

80 के दशक में नौतनवां विधानसभा की पहचान लक्ष्मीपुर विधानसभा क्षेत्र के रूप में थी। छात्र राजनीति से उभरे बाहुबली नेता वीरेंद्र प्रताप शाही ने लक्ष्मीपुर से चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया और 1981 में हुए विधानसभा के उपचुनाव में सियासत में कदम रखा, जहां उन्हें अखिलेश सिंह का साथ मिला। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वीरेंद्र प्रताप शाही पहली बार अमर मणि त्रिपाठी को शिकस्त देकर विधायक बने थे। साल 1985 में भी दूसरी बार वीरेंद्र प्रताप शाही ने अमर मणि त्रिपाठी को हराया था। अमरमणि तीसरे स्थान पर चले गए। जब कि दूसरे स्थान पर कांग्रेस प्रत्याशी रामचंद्र चौबे दूसरे स्थान पर रहे।
गोरखपुर-महाराजगंज में कितना बदले का गेम
पूर्वांचल की राजनीति में, खासकर महराजगंज और गोरखपुर बेल्ट में ब्राह्मण मतदाता बड़ी संख्या में हैं। अमर मणि त्रिपाठी अपने जनसंवाद कार्यक्रमों में विकास, पुरानी स्मृतियों और युवा बेरोजगारी जैसे मुद्दों का सहारा ले रहे हैं।

पूर्वांचल में ब्राह्मण राजनीति और जातीय समीकरणों के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले अमर मणि त्रिपाठी ने अपने सारे पत्ते अभी नहीं खोले हैं। एक तरफ जहां वे कांग्रेस के मंचों और नेताओं से संपर्क बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव लड़ने के लिए ताल भी ठोक रहे हैं। अमर मणि त्रिपाठी की कांग्रेस नेताओं के साथ बढ़ती नजदीकियों ने यह साफ कर दिया है कि 2027 के यूपी चुनाव में पूर्वांचल का सियासी संग्राम बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण होने वाला है।