पुलिस व प्रशासनिक अत्याचार और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले नेता थे स्वर्गीय हर्षवर्धन
कूट-कूट कर भरा था स्वाभिमान
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
महराजगंज जिले का जोगिया बारी गांव ! पूर्वांचल में”नेता जी” के नाम से मशहूर स्व. हर्षवर्धन का यह गांव जिले के फरेंदा कस्बे से तकरीबन चार किमी दूर, महराजगंज जाने वाले मुख्य सड़क से दो किलो मीटर पर दक्षिण की ओर स्थित है। 1977 से लेकर 2016 के कुछ महीनों तक यह गांव भ्रष्टाचार, पुलिस या प्रशासनिक जुल्म को बढ़ावा देने वालों के लिए भय का पर्याय था।
लखनऊ छात्र राजनीति से निकलकर 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर फरेंदा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने आए हर्षवर्धन यहीं के होकर रह गए।
आपातकाल के बाद हुए 1977 का चुनाव जनता पार्टी के नाम रहा। लखनऊ से दिल्ली तक इंदरा गांधी की सरकार बदल चुकी थी। हर्षवर्धन परिवर्तन के इस लहर में भी चुनाव हार गए थे। इस पहले चुनाव के हारने का सिलसिला 1985 तक जारी रहा लेकिन न तो वे हताश हुए और न ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग की उनकी धार कमजोर हुई।

देखा जाय तो स्व. हर्षवर्धन के राजनीतिक सफर में जीत कम हार ज्यादे रही। वे 1985 में विधायक, 1989 में सांसद और फिर कई बार हारने के बाद 2009 में फिर सांसद चुने गए। विधायक जनता पार्टी से हुए, 1989 में सांसद जनता दल से हुए और 2009 में दूसरी बार कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंचे।
हर्षवर्धन की खासियत यह रही कि वे जिस दल में रहे, आला कमान के सर्वाधिक प्रिय रहे। जनता पार्टी में चंद्रशेखर के करीबी, जनता दल में वीपी सिंह के, बसपा में मायावती के भी करीब रहे और जब कांग्रेस में आए तो सोनिया और राहुल के भी बेहद करीब हो गए। कह सकते हैं कि स्व. हर्षवर्धन का दल बदलने का भी रिकार्ड रहा। लेकिन वे कभी कुर्सी और सत्ता के लिए दल नहीं बदले। वे वसूलों के पक्के थे, स्वाभिमानी और जमीर वाले नेता थे।
उन्होंने जार्ज फर्नांडिस के करीबी होने का भी फायदा हासिल करने का मौका ठुकरा दिया था तब जब वे एनडीए का हिस्सा बने थे। हर्षवर्धन एनडीए को सांप्रदायिक दलों का गठबंधन मानते थे। चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मंत्री पद ठुकरा कर वीपी सिंह के साथ जाना कबूल किया। सिद्धांत ऐसा था कि राजनितिक फायदे के लिए सांप्रदायिक शक्तियों से कभी समझौता नहीं किया।
चार अक्टूबर को स्व. हर्षवर्धन की पुण्यतिथि पर उनके गांव जोगियाबारी में आयोजित कार्यक्रम उनकी स्मृति में एक पर्व जैसा होता है जहां पूर्वांचल भर से उनके चाहने वालों का जमावड़ा होता है। यहां सभी नम आंखो से उन्हें याद करते हैं।
यह आयोजन उनकी राजनितिक उत्तराधिकारी और कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया और चाचा आनंदवर्धन करते हैं। इस अवसर पर पूर्वांचल के कई जिलों से उनके चाहने वाले उपस्थिति होकर उन्हें नमः आंखों से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। हर्षवर्धन किसी एक क्षेत्र से सांसद या विधायक भले रहे हों, जुल्म और ज्यादती के खिलाफ वे कहीं भी उठ खड़े होते थे।
सिद्धार्थनगर जिले के बहुचर्चित करना कांड के खिलाफ दिल्ली तक की उनकी लड़ाई देश भर में चर्चा के केंद्र में रही। दर असल वे पूर्वांचल के जिलों में संघर्ष शील राजनीति के प्रेरणा पुरुष थे। हर्षवर्धन जी कभी लाभ के लिए दल नहीं बदले। सच यह है कि वे जिस दल में गए, वह दल ही शक्तिशाली हुआ। दल छोड़ा तो अपने लिए नहीं, जनसरोकार के लिए। उन्होंने बसपा को भी तब छोड़ा जब मायावती ने जिले का नाम बदलना चाहा। हर्षवर्धन जी का सुझाव था कि यदि जिले का नाम बदलना ही है तो शिब्बन लाल सक्सेना के नाम से किया जाय। वे नहीं मानीं तो उन्होंने बसपा छोड़ दी।
हर्षवर्धन कांग्रेस में आने से पहले भी कांग्रेस के हिमायती रहे। कहा करते थे की यह वसूलों वाली पार्टी है। कांग्रेस में आकर जिले में कांग्रेस को ऊंचाई तक पहुंचाया। आज उनकी बेटी सुप्रिया जी कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं, यह महराजगंज के लिए गर्व की बात है।
बताने की जरूरत नहीं कि सांसदों को क्षेत्र भ्रमण के लिए मिली सरकारी गाड़ी का खूब दुरूपयोग हो रहा है। उन गाड़ियों से सांसद के लग्गू भग्गू घूमते हैं और जहां चाहते हैं वहां ले जाते हैं। जबकि नेता जी उस सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल केवल क्षेत्र में भ्रमण के लिए करते थे। एक बार का वाकया यूं है कि हर्षवर्धन जी को बनारस किसी जरूरी काम से जाना था।
संयोग से कोई गाड़ी नहीं थी। एक साथी ने उसी सरकारी गाड़ी से बनारस चलने का सुझाव दिया इस पर उन्हें इस तरह डांट पड़ी थी कि वे जनाब एक हफ्ता तक हर्षवर्धन जी के पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
हर्षवर्धन जी समाजवादी विचारधारा के थे। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि जमींदार की थी लेकिन वे सर्वहारा सामंत थे। हर्षवर्धन के पिता स्व. योगेन्द्र पाल सिंह जमींदार परिवार से भले थे, वे जीवन पर्यन्त गरीबों मजदूरों के लिए लड़ते रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों के तमाम प्रलोभनों को लात मार दिए और अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी आंदोलन में जान जोखिम में डालकर सदैव अग्रणी भूमिका में रहे।
गरीबों और मजदूरों के प्रति दया भाव ऐसी थी कि वे खेतों में खुद ही हल संभाल लेते ताकि मजदूर कुछ पल विश्राम कर सके। स्व. हर्षवर्धन जीवन पर्यन्त अपने पिता के कदमों पर ही चलते रहे। 2014 का चुनाव आते आते हर्षवर्धन को स्वास्थ्य संकट से गुजरना पड़ा। वे चुनाव हार गए और गंभीर बीमारी के चलते 2016 में उनका निधन हो गया। हर्षवर्धन के निधन के बाद कांग्रेस ने उनकी बेटी सुप्रिया श्रीनेत में कांग्रेस का भविष्य तलाश लिया। सुप्रिया एक मशहूर टीवी चैनल में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रकार थीं। वे पत्रकारिता छोड़ कर अपने पिता की विरासत संभालने महराजगंज आ गईं और अपने स्व. पिता हर्षवर्धन की राजनीतिक विरासत को निरंतर आगे बढ़ा रहीं हैं। पिता की तरह वे भी गांधी परिवार के सर्वाधिक निकट हैं। उनमें भी पिता की तरह खुद्दारी कूट कूट कर भरा है। जुझारू पन और संघर्ष शीलता वैसी ही है जैसे हर्षवर्धन में थी।
