आपातकाल में जेल में बंद अटल जी से चार बार मिलने गयी थी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
31 अक्टूबर 1984 की सुबह जब पूरी दुनिया इंदिरा गांधी की हत्या की खबर से दहल उठी, तब विपक्ष के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी मॉस्को में थे। खबर मिलते ही वे बिना एक पल गंवाए दिल्ली के लिए रवाना हुए।
1 नवंबर 1984 को जब अटल जी, सफदरजंग रोड पहुँचे और इंदिरा जी के पार्थिव शरीर को देखा, तो उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े थे। यह एक राजनीतिक विरोधी का रोना नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मर्यादा का रुदन था जिसने सत्ता और विपक्ष को कभी दुश्मन नहीं बनने दिया।
1957 में जब 33 वर्ष के युवा अटल जी बलरामपुर से पहली बार लोकसभा पहुँचे, तब से लेकर 1984 तक का 51 वर्षों का इतिहास गवाही देता है कि वैचारिक मतभेदों के पहाड़ों के बावजूद दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के प्रति जो सम्मान दिखाया, उसकी आज के दौर में कल्पना भी नहीं की जा सकती।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जब 16 दिसंबर 1971 को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया, तब 17 दिसंबर 1971 को संसद के पटल पर खड़े होकर अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को ‘अभिनव दुर्गा’ के रूप में संबोधित करते हुए देश की विजय का जश्न मनाया था।
लेकिन उसी दौर का एक बेहद रोचक और कम जाना-माना किस्सा यह भी है कि इंदिरा गांधी संसद में अक्सर अटल जी की भाषण शैली का मजाक उड़ाते हुए कहती थीं कि “अटल जी बहुत हाथ हिला-हिलाकर बोलते हैं।”
इस पर अटल जी ने तुरंत जवाब दिया था, “श्रीमती गांधी, वो तो ठीक है, लेकिन क्या आपने कभी किसी को पैर हिलाकर बात करते देखा है?” इस तीखे व्यंग्य पर इंदिरा गांधी खुद अपनी हंसी नहीं रोक पाई थीं।
जब मार्च 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी और अटल बिहारी वाजपेयी देश के विदेश मंत्री बनकर साउथ ब्लॉक के दफ्तर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि दीवारों से पंडित जवाहर लाल नेहरू की तस्वीर हटा दी गई है।
अटल जी ने तुरंत अधिकारियों को तलब किया और कहा, “यह देश की पूर्व प्रधानमंत्री हैं, इनका सम्मान राजनीति से ऊपर है। इस तस्वीर को तुरंत वापस उसी जगह लगाइए।”
1988 का वह ऐतिहासिक लम्हा तो लोकतांत्रिक उदारता का शिखर था जब 1985 में एक किडनी गंवाने के बाद 1988 में अटल जी की सेहत फिर बिगड़ी। तब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अटल जी को अपने दफ्तर बुलाया और 1988 के संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) अधिवेशन के लिए प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाकर न्यूयॉर्क भेजा ताकि सरकारी खर्चे पर उनका विश्वस्तरीय इलाज हो सके।
21 मई 1991 को राजीव गांधी की शहादत के बाद अटल जी ने भारी मन से स्वीकार किया था कि “आज अगर मैं जीवित हूँ, तो राजीव गांधी की वजह से हूँ”।
1994 में जब स्विट्जरलैंड के जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNCHR) में पाकिस्तान ने भारत को घेरने के लिए प्रस्ताव रखा, तब 1991 से 1996 तक प्रधानमंत्री रहे पी.वी. नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने किसी कांग्रेसी नेता को नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर जिनेवा भेजा था। अटल जी ने वहां ऐसा भाषण दिया कि पाकिस्तान को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।
इसके विपरीत, 2014 के बाद की राजनीति में जो भाषाई पतन आया है, उसने लोकतंत्र की मर्यादा को तार-तार कर दिया है।
2012 के गुजरात चुनाव के दौरान सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ “जर्सी गाय” और “हाइब्रिड बछड़ा” जैसे शब्दों का प्रयोग, 2018 में राजस्थान के नोहर (हनुमानगढ़) की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री द्वारा “कांग्रेस की विधवा” जैसे कड़े तंज, और 2021 के बंगाल चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए “दीदी ओ दीदी” कहने का लहजा इस बात का सबूत है कि सत्ता का अहंकार किस कदर हावी हो चुका है।
जून 2022 में जब नेशनल हेराल्ड मामले के विरोध प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को दिल्ली की सड़कों पर पुलिस द्वारा बलपूर्वक रोककर घसीटा और हिरासत में लिया गया, तो इसने यह साफ कर दिया कि आज विपक्ष को वैचारिक प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि दुश्मन माना जा रहा है। उसके विपरीत जब इमरजेंसी के टाइम अटल जी को जेल में डाल गया था तो प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी अटल जी का हाल चल लेने 4 बार गई थी।
2014 से 2026 के बीच प्रचार और छवि निर्माण के नाम पर सरकारी खजाने से लगभग 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च कर दी गई, लेकिन जब संसद में विपक्ष कोई सवाल पूछता है तो माइक बंद करने के गंभीर आरोप लगते हैं और प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करने वाले जन प्रतिनिधियों को सड़कों पर घसीटकर जेलों में ठूंस दिया जाता है।
सत्ता में बैठे प्रधानमंत्री, गृह और उनके सहयोगी जिस प्रकार की असंसदीय और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वह इस देश की महान लोकतांत्रिक संस्कृति पर एक कलंक है। इतिहास गवाह है कि नेहरू, इंदिरा, राजीव, अटल और मनमोहन सिंह ने कभी विपक्ष के वजूद को मिटाने की कोशिश नहीं की।
यदि आज की सरकार खुद को सर्वोच्च समझकर विपक्ष का दमन करती रहेगी, तो देश की जनता को यह याद दिलाना होगा कि लोकतंत्र विरोधियों के सम्मान से चलता है, सत्ता के अहंकार और गाली-गलौज से नहीं।


