संख्या बल न के बराबर था फिर भी अटल जी के आवाज में नहीं थी कोई झिझक  

1959 में उसी नौजवान (अटल जी) ने संसद में खड़े होकर देश के सबसे कद्दावर प्रधानमंत्री की चीन और तिब्बत नीति की बखिया उधेड़ दी 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

साल 1957 का दौर था। संसद में एक तरफ 371 सांसदों के प्रचंड बहुमत का भारी-भरकम पहाड़ था, तो दूसरी तरफ महज 4 सांसदों के साथ एक 33 साल का नौजवान पहली बार चुनकर आया था-अटल बिहारी वाजपेयी।

संख्याबल न के बराबर था, लेकिन आवाज में जरा भी झिझक नहीं थी। 1959 में उसी नौजवान ने संसद में खड़े होकर देश के सबसे कद्दावर प्रधानमंत्री की तिब्बत और चीन नीति की बखिया उधेड़ दी। 1962 में आँखों में आँखें डालकर सत्ता से सीधा सवाल दागा था कि अगर दो-तीन चीनी घुस सकते हैं, तो सैकड़ों क्यों नहीं?

हैरानी की बात यह थी कि उस दौर में सवाल पूछने वाले को ‘राष्ट्रद्रोही’ नहीं कहा जाता था, न ही सुबह-सुबह दरवाजे पर एजेंसियों की दस्तक होती थी। प्रेस की आजादी पर खुद प्रधानमंत्री पहरा लगाते थे और मतभेदों के बावजूद संसद में सच सुनने का हौसला बाकी था।

फिर वक्त का पहिया घूमा।

आज की तस्वीर देखिए। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में देश लगातार नीचे फिसल रहा है। चुनावी बॉन्ड के जरिए हजारों करोड़ के खेल से राजनीति विज्ञापनों का बाजार बन गई। जब सीमा पर चीन की हरकतों पर सवाल उठते हैं, तो बहस के बजाय एक रटा-रटाया जुमला उछाल दिया जाता है कि “न कोई घुसा था, न कोई घुसा है।” और जब संसद में विपक्ष आवाज उठाने की कोशिश करता है, तो एक ही झटके में 146 सांसदों को बाहर का रास्ता दिखाकर खाली कुर्सियों के सामने कानून पास करवा लिए जाते हैं।

कैग (CAG) की रिपोर्ट जब सड़क निर्माण में बजट की लूट या सरकारी योजनाओं में फर्जीवाड़े की पोल खोलती है, तो जवाबदेही तय करने के बजाय अफसरों के तबादले हो जाते हैं और मुख्य मुद्दे को भावनात्मक शोरगुल के नीचे दबा दिया जाता है।

एक तरफ लाखों खाली पदों के बावजूद देश का नौजवान डिग्रियों का पुलिंदा हाथ में लिए ठोकरें खा रहा है, तो दूसरी तरफ ₹170 लाख करोड़ से ज्यादा के सार्वजनिक कर्ज का बोझ हर नागरिक के कंधे पर टिका दिया गया है। रोजमर्रा के सामान पर बेतहाशा जीएसटी का भार है, और बदले में परोसा जा रहा है सिर्फ नारों का तिलिस्म ।

पुराने दौर की तस्वीरें दिखाकर अपनी लोकतांत्रिक छवि चमकाने वाले शायद भूल गए हैं कि लोकतंत्र चाटुकारिता और तालियों के शोर से नहीं, बल्कि संसद में गूंजने वाले कड़वे सवालों से सांस लेता है। अगर अटल जी आज होते और सवालों से खाली कराई गई संसद का यह मंजर देखते, तो शायद वे फिर सीढ़ियों पर धरने पर बैठ जाते।

सत्ता कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, इतिहास भाषणों के रिकॉर्ड से नहीं – बल्कि इस बात से लिखा जाता है कि आपने जनता की आवाज और मुल्क की गरिमा के साथ क्या सुलूक किया।

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