2027 का रण.. यूपी विधानसभा चुनाव पर एक नजर

 

2027 में योगी को हराने का सपना देखना छोड़ दे विपक्ष

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

सत्ता रूढ़ एनडीए के मुखालफत इंडिया अलायंस प्रमुख विपक्षी गठबंधन है जिसका नेतृत्व लोकसभा में बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस के हाथ में है। इस गठबंधन की त्रासदी यह है कि एक ओर इसे कांग्रेस के भीतर से चुनौती मिल रही है तो दूसरी ओर गठबंधन में शामिल घटक दलों के नेताओं से। दोनों ओर से जारी शब्दों के व्यंग्य वाण पर गौर करें तो लगता है कि यह गठबंधन कभी भी विखंडन की स्थिति में पहुंच सकता है। हाल ही में हुए पांच प्रदेशों के चुनाव बाद जिस तरह तमिलनाडु के डीएमके ने गठबंधन से अपने सांसदों को अलग होने की घोषणा की है इससे माना जाना चाहिए कि इंडिया गठबंधन में विखंडन की शुरुआत हो गई है।

प्रारंभ में जब यह गठबंधन अस्तित्व में आया तब इसमें आम आदमी पार्टी भी थी और तृणमूल कांग्रेस भी। आम आदमी पार्टी पहले ही गठबंधन से अलग हो गई है, बंगाल की ममता बनर्जी की टीएमसी भी गठबंधन से अलग है। ठीक है कांग्रेस ने तमिलनाडु में नई नवेली पार्टी टीवीके को अपना नया साथी तलाश लिया है लेकिन इससे फिलहाल अभी कांग्रेस को कोई बड़ा फायदा नहीं दिख रहा। टीवीके के साथ कांग्रेस की कोई बड़ी हैसियत भी नहीं है। हो सकता है थलापति विजय की सरकार में कांग्रेस का कोई विधायक मंत्री भी न बने। हां ऐसा करके कांग्रेस ने तमिलनाडु में भाजपा के सहयोगी दल को सत्ता में आने से रोक जरूर दिया। लेकिन इसके बदले लोकसभा में उसे बड़ी कीमत 

चुकानी पड़ी। डीएमके के सांसद राहुल गांधी के साथ खड़े रहते थे भले ही कांग्रेस सांसदों के साथ मेज ही थपथपाने का काम क्यों न करते रहे।

इंडिया गठबंधन के मौजूदा हाल को देखें तो गठबंधन में जो बचे हैं, वे कब तक बचे रहेंगे, यह एक बड़ा सवाल है। महाराष्ट्र में राष्ट्र वादी कांग्रेस पार्टी और शिव सेना (ठाकरे) की कांग्रेस से मनमुटाव चल रहा है। झारखंड में हेमंत सोरेन भी कांग्रेस को बहुत भाव नहीं दे रहे। उनके एनडीए का हिस्सा बनने की अटकलें लगाई जाती रही है। बिहार में आरजेडी और कांग्रेस के बीच बहुत कुछ ठीक नहीं चल रहा। गठबंधन को लेकर बची खुची संभावना यूपी में ही है लेकिन जिस तरह कांग्रेस और सपा नेताओं के बीच जुबानी जंग जारी है उससे यह कहना मुश्किल है कि सपा और कांग्रेस का साथ विधानसभा चुनावों तक बचा रह पाएगा? बंगाल में ममता की हार के बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव उनसे मिलने बंगाल पहुंच गए। फिर तमिलनाडु जाकर स्टालिन से भी मिले। यहां जाकर उन्होंने कहा कि हम वो नहीं जो मुश्किलों में साथ छोड़ दें। अखिलेश के इस रवैए से थर्ड फ्रंट की भी संभावना पर चर्चा शुरू हो गई।

अखिलेश यादव थर्ड फ्रंट के हिमायती हैं कि नहीं इस पर फिलहाल कुछ भी कहना उचित नहीं है, हां बंगाल हार के बाद ममता बनर्जी की आंखें जरूर खुलती हुई दिख रही है। उन्होंने इंडिया अलायंस को मजबूत करने की बात कही है। ममता बनर्जी वहीं हैं जिनके वजह से जदयू इंडिया अलायंस से अलग होने को मजबूर हुआ। वे नहीं चाहतीं थीं कि नीतीश कुमार इंडिया अलायंस के संयोजक बनें। लोक सभा में सरकार के किसी विरोध के मुद्दे पर उन्होंने अपने सांसदों को कसके लगाम से कस रखा था कि वे सरकार के विरोध का हिस्सा न बनें। लोक सभा और विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को किसी लायक न समझने वाली ममता बनर्जी को अब इंडिया अलायंस की मजबूती का ख्याल अचरज में डालता है। लेकिन एक बात हो सकता है कि इंडिया अलायंस को लेकर कांग्रेस पर हर ओर से उठ रहे सवालों पर विराम लगाने के लिए अलायंस का बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी को लीड करने की जिम्मेदारी सौंपने की घेरेबंदी कर सकता है। यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस को भी इससे शायद कोई एतराज न हो।

थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो याद आएगा जब राज्यसभा में सपा के राम गोपाल यादव ने राहुल गांधी पर दमदारी से कोई मुद्दा न उठा पाने का तोहमत लगाया था और टीएमसी के कल्याण बनर्जी ने संसद न चलने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था। राहुल गांधी को जिस तरह हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव हारने का जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ इंडिया अलायंस के भीतर आवाज उठी थी उसी तरह आज बंगाल, असम और पुडुचेरी का चुनाव हारने के बाद राहुल पर जिम्मेदारी डाल कर गठबंधन के भीतर फिर कोई खिचड़ी पकाने की कोशिश हो रही है। कांग्रेस को कमजोर साबित करने की कोशिश केवल गठबंधन के दूसरे दल के नेता ही नहीं कर रहे, इस वक्त तो कांग्रेस के भीतर ही एक से एक नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते नजर आ रहे हैं। इसमें शशि थरूर, मनीष तिवारी, शकील अहमद, मणि शंकर अय्यर जैसे नेताओं के नाम शामिल हैं। इसमें कोई ऊल-जुलूल बयान देकर तो कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लंबा चौड़ा लेख लिखकर अपनी खीझ मिटा रहा है। कांग्रेस के भीतर के ये वे लोग हैं जो अपने स्तर से इंडिया अलायंस की जड़ें खोखला करने पर कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

अभी जो इंडिया अलायंस में सबसे मजबूत स्तंभ समाजवादी पार्टी है, इसे भी हिलाने की कोशिश शुरू हो गई है। और यह कोशिश दोनों ओर से है। ताजा बयान कांग्रेस के इमरान मसूद का आया है जिसमें उन्होंने ममता बनर्जी की हार से सपा को सबक लेने की नसीहत दी है। इमरान मसूद सपा से ही कांग्रेस में आए हैं। इसके पहले मुंबई में सपा विधायक अबू हासिम आजमी भी कांग्रेस को औकात में रहने की नसीहत दे चुके हैं। सपा के ही एक प्रवक्ता आईपी सिंह तो सीधे राहुल गांधी को अनाप सनाप बक चुके हैं। संतोष यह है कि अभी तक अखिलेश यादव और राहुल गांधी की तरफ से एक दूसरे के प्रति सीधा ऐसा कोई आरोप सामने नहीं आया है।

यूपी में विधानसभा चुनाव के बमुश्किल सात आठ महीने रह गए हैं। इस बीच सपा और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना है लेकिन सपा और कांग्रेस दोनों दलों में कुछ ऐसे लोग हैं जो चाहते हैं कि बिना गठबंधन के चुनाव हो। जबकि दोनों ही दलों के वे नेता भली भांति जानते हैं कि अकेले दम पर सपा कभी भी भाजपा को नहीं हरा पाएगी। यूपी के चुनाव में कांग्रेस की क्या बात करें, जिसकी कि कोई हैसियत नहीं लेकिन दोनों गठबंधन में चुनाव लड़कर भाजपा का हाल लोकसभा की तरह विधानसभा में भी कर देंगे, इसमें कोई दो राय नहीं। तो क्या सपा और कांग्रेस में भाजपा के स्लीपर सेल हैं जो दोनों के गठबंधन में बिखंडन की भूमिका निभा रहे? यदि ऐसा है तो इन्हें सपा को भी पहचानना होगा और कांग्रेस को भी।

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