बाहुबलियों की सीट से मशहूर नौतनवां विधानसभा क्षेत्र में 2027 के चुनाव में किसका जोर? 

ऋषि त्रिपाठी,अमन मणि त्रिपाठी, कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह या कोई और?

साल 1980 के विधानसभा चुनाव में मतदान से एक दिन पूर्व निर्दलीय प्रत्याशी घुरहू सिंह के असामयिक निधन के बाद लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट पर पड़ी बाहुबलियों और माफियाओं की नजर 

साल 1981से साल 2022 तक वीरेंद्र प्रताप शाही 02 बार, कुंवर अखिलेश सिंह 02 बार,अमर मणि त्रिपाठी 04 बार, कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह 01बार, अमन मणि त्रिपाठी 01बार और 2022 में ऋषि त्रिपाठी पहली बार विधायक चुने गए 

सार

महाराजगंज जिले की नौतनवां विधानसभा सीट ने पूर्वांचल के बाहुबलियों के लिए साल 1981में ही सियासत का रास्ता खोल दिया था। सबसे पहले वीरेंद्र प्रताप शाही ने 1981 में यहीं से निर्दलीय विधायक बन राजनीति में एंट्री मारी थी। पुनः 1984 में भी उन्होंने जीत का परचम लहराया। साल 1989 में अमर मणि त्रिपाठी की भी इसी सीट से राजनीति में एंट्री हुई। फिर उन्होंने 1996,2002 और 2007 में जीत हासिल की। साल 1991 में कुंवर अखिलेश सिंह पहली बार चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे। पुनः 1993 में भी दूसरी बार उन्होंने जीत दर्ज की। 2012 में कुंवर अखिलेश सिंह के अनुज कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर पहली बार विधानसभा का स्वाद चखा। 2017 अमन मणि विधायक बने । उन्होंने 2017 का चुनाव निर्दलीय प्रत्‍याशी के रूप में जेल में रहते हुए जीता था। साल 2022 में निषाद-भाजपा गठबंधन से ऋषि त्रिपाठी 90 हजार वोट पाकर कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह लगभग (79 हजार मत) और अमन मणि त्रिपाठी लगभग (47 हजार मत) को करारी शिकस्त दी और पहली विधानसभा पहुंचे। 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

महाराजगंज! नौतनवां विधानसभा सीट पूर्वांचल की चर्चित सीटों में से एक है। यह सीट ज्‍यादातर माफिया और बाहुबलियों के कब्‍जे में रही है। बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही, अमर मणि त्रिपाठी और कुंवर अखिलेश सिंह, कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह,अमन मणि त्रिपाठी जैसे गिने चुने किरदार हैं, जिनके इर्द-गिर्द ही नौतनवां की सियासी कहानी चल रही है। वीरेंद्र प्रताप शाही ने इसी सीट से चुनाव लड़कर अपनी सियासी एंट्री मारी थी। वीरेंद्र प्रताप शाही के इस सीट को छोड़कर जाने के बाद अमर मणि त्रिपाठी का एकछत्र राज हो गया। अमर मणि त्रिपाठी कवयित्री मधुमिता शुक्‍ला हत्‍याकांड में फिलहाल उम्रकैद की सजा काट कर बाहर आ चुके हैं। वर्तमान में ऋषि त्रिपाठी यहां से विधायक हैं। अमनमणि भी अपनी पत्‍नी सारा सिंह की हत्‍या में आरोपी हैं जिनका मुकदमा अभी न्यायालय में विचाराधीन है। पिछला चुनाव उन्‍होंने जेल में रहते हुए ही जीता था। इस सीट पर अब तक भाजपा का खाता नहीं खुला है।

नौतनवां विधानसभा सीट पहले 190 लक्ष्‍मीपुर के नाम से जाना जाता था। 2008 के परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर 316 नौतनवां कर दिया गया। बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही ने 1981 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्‍याशी के रूप में यहां से जीत दर्ज की थी। उन्‍होंने तब कम्‍युनिस्‍ट और कांग्रेस पार्टी के समर्थन से चुनाव लड़ रहे अमर मणि त्रिपाठी को मामूली वोटों के अंतर से हराया था। इसके बाद 1984 के चुनाव में वह दोबारा जीते। अमरमणि त्रिपाठी 1989 में पहली बार कांग्रेस के टिकट विधानसभा पहुंचे। 1991 जनता पार्टी और 93 में समाजवादी पार्टी से कुंवर अखिलेश सिंह विधायक बने। 1996 के चुनाव में अमरमणि ने फिर वापसी की और कांग्रेस के टिकट पर ही दोबारा विधायक बने।

2002 में बहुजन समाज पार्टी और 2007 में समाजवादी पार्टी से विधानसभा पहुंचे। उम्रकैद की सजा होने के बाद 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर अमरमणि के बेटे अमनमणि त्रिपाठी ने चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस के कुंवर अखिलेश सिंह के भाई कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह के हाथों पराजित हो गए। 2017 में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अमन मणि त्रिपाठी को टिकट देने से इनकार कर दिया और 2012 में अमन मणि को पराजित करने वाले कांग्रेस विधायक कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना को पार्टी ने टिकट दे दिया। त्रिपाठी परिवार ने इसे अपना अपमान माना और अमन मणि त्रिपाठी जेल में रहकर निर्दलीय ही चुनाव मैदान में कूद गए। अमन मणि को सिर्फ नामांकन करने का ही मौका मिला, इसके बाद अपनी पत्‍नी सारा सिंह की हत्‍या के आरोप में वह जेल चले गए। उनके प्रचार की कमान उनकी दोनों बहनों तनुश्री और अलंकृता मणि त्रिपाठी ने संभाली। जेल में रहते हुए ही अमन मणि त्रिपाठी ने निवर्तमान विधायक व सपा प्रत्‍याशी कुंवर कौशल उर्फ मुन्ना सिंह को 32 हजार से अधिक वोटों से पराजित कर दिया‌ था। इस चुनाव में भाजपा प्रत्‍याशी समीर त्रिपाठी तीसरे नंबर पर रहे।

 

जातीय समीकरण की बात की जाए तो 

2017 में कुल 3.49 लाख मतदाताओं वाली नौतनवां विधानसभा सीट पर सबसे अधिक ब्राह्मण वोटर थे। जिनकी संख्‍या 85 हजार के करीब है। दलित वोटर करीब 70 हजार और मुस्‍लिम मतदाताओं की संख्‍या 65 हजार थी। यादव 50 हजार, वैश्‍य 46 हजार और क्षत्रिय वोटर करीब 25 हजार था।

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