हमारे बुजुर्ग ठीक ही कहते थे कि अन्याय के खिलाफ जब लहू गवाही देता है, तो उसकी गूंज दूर तक जाती है।
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
भरत तिवारी की शहादत कोई साधारण घटना नहीं है। यह दमन और अहंकार के खिलाफ एक शंखनाद है। दमनकारी सोच रहे थे कि इस कायरतापूर्ण कृत्य से आवाजें दबा दी जाएंगी। भय का माहौल बनाने के लिए पीड़ित परिवार पर ही उल्टे मुकदमें थोप दिए गए। लेकिन सच को दबाने की हर कोशिश खुद उनके गले का फंदा बन गई है। आज स्थिति यह है कि जो लोग इस साजिश में शामिल थे, उन्हें अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है।
अग्रिम जमानत की उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं और जिन्होंने पर्दे के पीछे से आदेश दिए थे, उनके भीतर अब डर का भूचाल आ चुका है। रात के अंधेरे में परिजनों को धमकाने की कोशिशें इस बात का सबूत हैं कि षड्यंत्रकारी पूरी तरह बौखला चुके हैं। लेकिन वे भूल गए कि यह डर फैलाने का नहीं, बल्कि उनके खुद के बेनकाब होने का वक्त है।
जैसे-जैसे निष्पक्ष जांच का दायरा बढ़ेगा, इस चक्रव्यूह को रचने वाले खुद इसमें फंसते चले जाएंगे। इसे कहते हैं कि न्याय की आवाज कभी मरती नहीं, वह और बुलंद होकर सामने आती है। अब यह मामला किसी एक परिवार या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। युवाओं, बुद्धिजीवियों और न्यायप्रिय नागरिकों के समर्थन से यह एक महासंग्राम का रूप ले चुका है।
संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस गूंज को सुना जाएगा और जब तक केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई ) के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो जाता, यह संघर्ष थमेगा नहीं।
वीर भूमि के सपूतों को किसी सरकारी मुहर की जरूरत नहीं है समाज उन्हें अपने दिल में शहीद का दर्जा पहले ही दे चुका है। यह लड़ाई अब अंजाम तक पहुंचकर ही रुकेगी। आजाद तिवारी लड़े थे गोरों से, भरत तिवारी लड़े हैं चोरों से।

हमारे समाज मे बड़े बुजुर्ग कहते थे कि खून बोलता है.. वह खून कैसे बोलता है यह मैं आपको बता रहा हूं।
जब भरत तिवारी स्पॉट पर ही मर चुके थे, इसलिए आपका एक शेयर भाजपा और पुलिस अधिकारियो की चिता की 1-1 लकड़ी बनकर जलेगा… जनजन तक आग को ले जाना है।
पहले तो लोग सोचते थे कि इस तरह की हत्या से लोग डर जाएंगे फिर सोचा की डर को और बढ़ा दो तो घर वालों पर देते हैं तो दो FIR और करा दिया गया। उसके बाद सोचे की हमारे ऊपर तो कोई FIR होगी नहीं लेकिन वह भी हो गई।
अब जो लोग उसमें नामजद हुए हैं उनको अंतरिम बेल मिलनी नहीं है। उन्होंने तो किसी की आदेश से ही हत्या किया होगा न, अब जिन्होंने आदेश दिया उनके अंदर खड़मंडल मचना स्वाभाविक है कि कैसे बचा जाए?
तो ये डर का परिचायक है अभी कल रात को 12:00 बजे एसपी स्वयं भरत तिवारी जी के घर पहुंचे उनके 16 वर्षीय भाई को धमकाया कि अब इस मामले को आगे मत बढ़ाओ।
लेकिन कोई असर नहीं हुआ बल्कि उल्टा पड़ गया दांव, आ बैल मुझे मार ये खुद ही एक्सपोज हो गये और लाइट में आ गये
अब उनके ऊपर वाले अधिकारी भी सोच में पड़े हैं।अब जांच का दायरा जैसे-जैसे विस्तृत होता जायेगा वैसे-वैसे इन लोगों के फसने की संभावना और बलवती होती जाएगी। यह डर अब डर फैलाने वाले लोगों में समा चुका है क्योंकि अपने बिछाए जाल में खुद फंसते जा रहें है सभी के सब!
इसको कहते हैं कि खून सर चढ़कर बोल रहा है जबकि मरने वाला तो मर चुका है… तो अपने अपने बचाव के लिए बड़े अधिकारियों ने भी घेराबंदी शुरू कर दी है।
जांच सीबीआई की तो होकर रहेगी बस केवल ये देखना है कि समय और अभी कितना लगता है?
क्योंकि ये लड़ाई नहीं महासंग्राम घोषित हो चुका है फैसला खुद परिवार के भी हाथ में न रहकर पूरे देश में युवा बुद्धिजीवियों से होते हुए सुप्रीम कोर्ट संसद का रुख कर चुका है। बड़े बड़े नेता वीर भूमि की मिट्टी सर पर लगाकर कसम खा चुके है। शहीद का दर्जा हमको सरकार से नहीं चाहिए वो हम दे चुके है।