किसी विचारक ने सच ही कहा है—
“यदि अन्याय आपको विचलित नहीं करता, तो समझ लीजिए कि आपने अन्याय को स्वीकार कर लिया है।”
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
महराजगंज! यह अत्यंत चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस राष्ट्र के करोड़ों युवा निष्पक्ष एवं पारदर्शी परीक्षा-व्यवस्था की अपेक्षा रखते हैं, उसी राष्ट्र में परीक्षा पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर जवाबदेही की मांग को लेकर एक व्यक्ति को अपने प्राणों की बाजी लगानी पड़ रही है।
लद्दाख के सुविख्यात पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिंतक सोनम वांगचुक 28 जून 2026 से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे हैं। आज उनके संघर्ष का 19वां दिन है—यह संघर्ष न किसी व्यक्तिगत लाभ का है, न पद या राजनीतिक महत्वाकांक्षा का, बल्कि देश के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़े परीक्षा पेपर लीक प्रकरण में जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग का है।
लगातार अनशन से उनकी स्वास्थ्य स्थिति दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती जा रही है, फिर भी दुर्भाग्यवश केंद्र सरकार न तो उनकी मांगों पर सार्थक संवाद के लिए आगे आई है, न ही इस विकट स्थिति के समाधान हेतु कोई ठोस पहल करती दिख रही है। यह मौन स्वयं में एक प्रश्नचिह्न है—क्या संवेदनशीलता अब शासन-व्यवस्था से पूरी तरह लुप्त हो चुकी है?
यह संघर्ष किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के सपनों, उनकी मेहनत और उनके भविष्य की रक्षा का संघर्ष है।
इतिहास साक्षी है कि अहिंसक आंदोलन और अनशन भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा की आत्मा रहे हैं। महात्मा गांधी के सत्याग्रहों ने तत्कालीन शासन को संवाद और समझौते की राह पर चलने के लिए विवश किया। क्रांतिकारी जतिन दास की ऐतिहासिक भूख हड़ताल ने पूरे देश की चेतना को झकझोरा।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक सत्याग्रहों और जनआंदोलनों का नेतृत्व कर अंग्रेजी शासन को जनता की आवाज़ सुनने पर विवश किया। सरदार वल्लभभाई पटेल सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं के शांतिपूर्ण आंदोलनों के समक्ष भी तत्कालीन सत्ता को झुककर वार्ता और समाधान का मार्ग अपनाना पड़ा।
विडंबना यह है कि परतंत्र भारत में भी अंग्रेजी शासन जनदबाव और अहिंसक आंदोलनों की गंभीरता को समझते हुए संवाद के लिए बाध्य हो जाता था। ऐसे में स्वतंत्र भारत की निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार से यह अपेक्षा और भी अधिक स्वाभाविक हो जाती है कि वह जनहित के मुद्दों पर संवेदनशीलता दिखाए और संवाद के माध्यम से समाधान तलाशे।
इसी संदर्भ में फरेंदा के लोकप्रिय विधायक माननीय वीरेंद्र चौधरी, कांग्रेस जिलाध्यक्ष विजय सिंह एडवोकेट, आनंद नगर नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष जय प्रकाश लाल, कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष डॉ रामनारायन चौरसिया तथा अन्य कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
उन्होंने कहा कि सरकार बिना किसी विलंब के सोनम वांगचुक से वार्ता आरंभ करे, उनकी मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार करे तथा उनके जीवन की रक्षा सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक कदम तत्काल उठाए।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही में ही निहित होती है। युवाओं के भविष्य से जुड़े इन प्रश्नों पर मौन साधना अब पर्याप्त नहीं—समय की मांग है सार्थक और त्वरित समाधान की।