“पहले पुनर्वास, फिर हटाने की कार्रवाई” — भूमिहीन सुकुम्बासियों का सरकार को अल्टीमेटम, सीडीओ के माध्यम से प्रधानमंत्री को सौंपा ज्ञापन

मनोज कुमार त्रिपाठी 

काठमांडू। नेपाल सरकार द्वारा भूमिहीन दलित, भूमिहीन सुकुम्बासी तथा अव्यवस्थित बसोबासियों के लिए जारी 35-दिवसीय सार्वजनिक सूचना के बाद राजधानी काठमांडू में रहने वाले भूमिहीन परिवारों में चिंता बढ़ गई है। इसी को लेकर नागरिक बचाव दल नेपाल के सभापति माधव कल्पित तथा भूमिहीन सुकुम्बासी समायोजन समिति के संयोजक नरेंद्र लामा के नेतृत्व में काठमांडू के प्रमुख जिला अधिकारी (सीडीओ) के माध्यम से प्रधानमंत्री एवं संबंधित सरकारी निकायों को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में मांग की गई है कि किसी भी प्रकार की कार्रवाई से पहले प्रभावित परिवारों के लिए सुरक्षित और स्थायी आवास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

ज्ञापन में कहा गया है कि वर्षों से काठमांडू और आसपास के क्षेत्रों में रह रहे भूमिहीन नागरिक दिहाड़ी मजदूरी, छोटे व्यापार और अस्थायी रोजगार के सहारे जीवनयापन कर रहे हैं। सरकार द्वारा जारी हालिया 35-दिवसीय सूचना के बाद हजारों परिवारों में विस्थापन का भय पैदा हो गया है। संगठनों का कहना है कि अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि वे दूसरे स्थान पर जाकर बस सकें। ऐसे में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के उन्हें हटाना उनके जीवन, रोजगार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव डालेगा।

सभापति माधव कल्पित और संयोजक नरेंद्र लामा ने ज्ञापन में नेपाल के संविधान का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन, आवास और सामाजिक न्याय का अधिकार प्राप्त है। उन्होंने मांग की कि जहां-जहां भूमिहीन परिवार वर्तमान में रह रहे हैं, वहीं उनकी सूची तैयार की जाए, मौजूदा बस्तियों को आधार बनाकर सुरक्षित एवं दीर्घकालिक आवास उपलब्ध कराया जाए, सूचीकरण के लिए जिला मुख्यालय में अनिवार्य उपस्थिति की शर्त पर पुनर्विचार किया जाए तथा शिविरों, बस्तियों और सड़क किनारे रहने वाले नागरिकों के घर-घर जाकर तथ्य एवं विवरण एकत्र किए जाएं। साथ ही यह भी मांग की गई कि किसी भी नागरिक को वैकल्पिक पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना जबरन विस्थापित न किया जाए।

ज्ञापन के अंत में नागरिक बचाव दल नेपाल के सभापति माधव कल्पित और भूमिहीन सुकुम्बासी समायोजन समिति के संयोजक नरेंद्र लामा ने कहा कि वे सरकार से किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि केवल सुरक्षित आवास, सम्मानजनक जीवन और समान व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। उन्होंने नेपाल सरकार से अपील की कि मानवीय संवेदनशीलता और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप भूमिहीन नागरिकों का पहले पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए और उसके बाद ही आगे की कोई प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।

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