आगामी 2027 में विधायक वीरेंद्र चौधरी हो सकते हैं मुख्यमंत्री पद का चेहरा- डॉ नरेश कुमार केंद्रीय पर्यवेक्षक
पूर्वांचल के भावी राजनीति के ‘गेमचेंजर’ बनेंगे वीरेंद्र चौधरी
हमेशा से बाहुबल, धनबल और विरासत की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही है पूर्वांचल की सियासत
लेकिन इस पुराने ढर्रे को तोड़कर जिस एक नेता ने अपने जमीनी नेटवर्क, बेबाक तेवर और सांगठनिक चातुर्य से अपनी अलग पहचान बनाई है, वे हैं फरेन्दा के लोकप्रिय विधायक वीरेंद्र चौधरी
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
महराजगंज! जब राजनीति में ‘लहरों’ के भरोसे चुनाव जीते जा रहे थे, तब वीरेंद्र चौधरी ने ‘कैडर और जनता’ के भरोसे अपनी ऐसी मजबूत किलेबंदी की, जिसे भेद पाना विरोधियों के लिए नामुमकिन सा हो गया।
‘जीरो से हीरो’ बनने का राजनीतिक स्ट्राइक रेट वीरेंद्र चौधरी की सबसे बड़ी खूबी उनका राजनीतिक चक्रव्यूह तोड़ना है। जब राज्य स्तर पर कांग्रेस संघर्ष के दौर से गुजर रही थी, तब उन्होंने महराजगंज में पार्टी के झंडे को न सिर्फ थामे रखा, बल्कि उसे जीत के परचम में बदल दिया।
उन्होंने हर विफलता से सीख ली, क्षेत्र के एक-एक गांव, टोले और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की ऐसी फौज तैयार की जो 24 घंटे उनके लिए समर्पित रहते हैं।
दिल्ली दरबार में ‘पूर्वांचल का भरोसेमंद किला’ वीरेंद्र चौधरी सिर्फ यूपी कांग्रेस के प्रांतीय स्तर के नेता नहीं हैं, वे कांग्रेस आलाकमान के थिंक टैंक में शामिल पूर्वांचल का मुख्य चेहरा हैं।
राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और प्रियंका गांधी के साथ उनका सीधा संवाद यह दर्शाता है कि दिल्ली के लिए उत्तर प्रदेश (विशेषकर पूर्वांचल) की रणनीति तय करते समय वीरेंद्र चौधरी का सुझाव कितना मायने रखता है।
पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में संगठन को धार देने और नए जनाधार को जोड़ने का दायित्व वे बखूबी संभाल रहे हैं।
आक्रामकता परिपक्वता का अनोखा संयोजन एक राजनेता के रूप में वीरेंद्र चौधरी की शैली में दो चीजें एक साथ देखने को मिलती हैं- मैदान पर आक्रामकता और मेज पर परिपक्वता।
जहां एक तरफ जनता की समस्याओं, खासकर भ्रष्टाचार, पुलिस उत्पीड़न या किसानों के उत्पीड़न के मामले में वे थाने से लेकर कलेक्ट्रेट तक का घेराव करने से नहीं हिचकिचाते।
वहीं दूसरी ओर, विधानसभा में वे पूरी तैयारी और आंकड़ों के साथ बात रखते हैं, जिससे सत्ता पक्ष को भी उन्हें गंभीरता से सुनना पड़ता है।
पूर्वांचल में गैर-भाजपा और गैर-सपा राजनीति की बात करें, तो वीरेंद्र चौधरी एक बड़ा विकल्प बनकर उभरे हैं। कुर्मी समाज और संपूर्ण ओबीसी वर्ग में उनकी जबरदस्त लोकप्रियता है, लेकिन उनकी राजनीति किसी एक जाति तक सीमित नहीं है।
हर वक्त उपलब्ध रहने वाला विधायक होने के कारण युवाओं, किसानों और स्थानीय व्यापारियों के बीच उनका अपना एक वफादार वोट बैंक तैयार हो चुका है।
वीरेंद्र चौधरी की मौजूदा राजनीतिक आक्रामकता यह साफ संकेत देती है कि वे केवल एक बार के विधायक बनकर संतुष्ट होने वालों में से नहीं हैं।
महाराजगंज,गोरखपुर, सिद्धार्थनगर और कुशीनगर के पूरे बेल्ट में वे आने वाले चुनावों में परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति में,
जहां नए और ऊर्जावान नेतृत्व की मांग बढ़ रही है, वीरेंद्र चौधरी का कद आने वाले समय में प्रदेश स्तर पर और भी बड़ा और निर्णायक होने वाला है।
विधायक वीरेंद्र चौधरी पूर्वांचल की राजनीति की वह ‘अदृश्य ताकत’ हैं जो शांत रहकर नहीं, बल्कि अपने काम, आक्रामक भाषणों और जमीनी संघर्ष से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं।







