अस्मिता चंद के बसपा में जाते ही चक्रव्यूह में फंसी भाजपा? 

चिल्लूपार में बसपा का दांव, अस्मिता चंद के उतरने से बदले समीकरण

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

गोरखपुर! आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बसपा ने गोरखपुर-बस्ती मंडल की 41 विधानसभा सीटों में पहली घोषणा करते हुए चिल्लूपार से अस्मिता चंद को प्रभारी और प्रत्याशी बनाया है। लंबे समय तक भाजपा में सक्रिय रहीं अस्मिता चंद के बसपा में आने से क्षेत्र की सियासत में नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। चंद परिवार का चिल्लूपार क्षेत्र में पुराना राजनीतिक प्रभाव माना जाता है। अस्मिता पिछले दो दशक से अधिक समय से क्षेत्र में सक्रिय हैं और भाजपा से टिकट की दावेदारी करती रही थीं, लेकिन टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने बसपा का रुख किया। 

बता दें कि अस्मिता का राजनीतिक सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। उन्होंने साल 2007 में भाजपा टिकट की दावेदारी की थी, लेकिन टिकट उनके ससुर को मिलने के बाद वह निर्दल चुनाव मैदान में उतर गई थीं। उस चुनाव में उन्हें 7,723 वोट मिले थे। परिवार की राजनीतिक राहें पहले भी अलग-अलग रही हैं। सीपी चंद कभी सपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं और बाद में भाजपा में शामिल होकर एमएलसी बने, जबकि अस्मिता अब बसपा के साथ हैं। चिल्लूपार में तिवारी परिवार का भी लंबे समय से प्रभाव रहा है। 

हरिशंकर तिवारी कुल 6 बार लगातार उत्तर प्रदेश की चिल्लूपार विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे।

पहला चुनाव उन्होंने वर्ष 1985 में पहली बार जेल में रहते हुए निर्दलीय (IND) उम्मीदवार के रूप में यह चुनाव जीता था। इसके बाद वे 1989, 1991, 1993, 1996 और 2002 में लगातार जीत दर्ज कर विधायक बने।

विधायक रहने के दौरान वे उत्तर प्रदेश में कई अलग-अलग दलों की सरकारों में कुल 5 बार कैबिनेट मंत्री भी रहे।

साल 2017 में पंडित हरिशंकर तिवारी के छोटे बेटे विनय शंकर तिवारी बसपा के टिकट पर लड़े और अपने धुर विरोधी भाजपा प्रत्याशी राजेश त्रिपाठी को बुरी तरह पराजित कर विधायक चुने गए थे।

2022 में वह सपा के टिकट पर भाजपा प्रत्याशी राजेश त्रिपाठी से मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे।  

हालांकि 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी से उनकी मजबूत दावेदारी मानी जा रही है। ऐसे में अस्मिता चंद के बसपा प्रत्याशी बनने के बाद चिल्लूपार में मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार बढ़ गए हैं। बसपा अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ चंद परिवार के प्रभाव और अस्मिता की लंबे समय से क्षेत्र में सक्रियता को चुनावी ताकत में बदलने की कोशिश करेगी। वहीं भाजपा और सपा को भी अब अपनी रणनीति नए सिरे से तैयार करनी पड़ सकती है।

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