बालेन शाह सरकार को लेकर क्या सोच रहा है जेन जी
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
नेपाल में बालेन शाह सरकार के छः महीने पूरे होने को है। जबकि जेन जी आंदोलन के एक साल हो गए। बालेन शाह सरकार का जन्म जेन जी आंदोलन की कोख से हुआ है। इस बीच देखना दिलचस्प होगा कि बालेन शाह ने जेन जी आंदोलन में शहीद हुए युवाओं के परिजनों से जो वादा किया था, उस पर वे कितना अमल कर पाए?
8-9 सितंबर 2025 को नेपाल का जेन जी आंदोलन सत्ता परिवर्तन की बड़ी घटना की दृष्टि से देखा गया। नेपाल के इस घटना ने दुनिया के लोकतांत्रिक देशों को हिला कर रख दिया था वहीं युवाओं को अपनी ताकत का एहसास भी कराया था।

यद्यपि कि इस घटना के कई विकृत दृश्य भी उभर कर सामने आए। जैसे काठमांडू सहित अन्य शहरों में सरकारी इमारतों में आगजनी, सरकारी दस्तावेजों को जलाना, राजनीतिक नेताओं के साथ मारपीट, उनके घरों को आग के हवाले करना, उस वक्त के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को सेना के कैंप में छिपने को मजबूर करना, पूर्व प्रधानमंत्री व नेपाली कांग्रेस नेता शेर बहादुर देउबा, उनकी पत्नी आरजू राणा देउबा के साथ सार्वजनिक रूप से अभद्रता आदि।
बहरहाल सोशल मीडिया के एक प्लेटफार्म पर बैन लगाने से युवाओं में पनपे आक्रोश का अंजाम सत्ता परिवर्तन के रूप में होगा ऐसा शायद ही किसी ने सोचा था। ओली सरकार के सत्ताच्युत होने के बाद आंदोलनकारी के जो प्रमुख चेहरे थे जिसमें मौजूदा गृहमंत्री सुदन गुरूंग खास थे, उनके और राष्ट्रपति राम चंद्र पौड़ेल,सेना प्रमुख के बीच हुए समझौते के बाद अंतरिम सरकार का मसौदा तैयार हुआ। काफी छानबीन के बाद उच्च न्यायालय की रिटायर्ड जज सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ जिन्होंने छः महीने के भीतर आम चुनाव कराकर सत्ता हस्तांतरित करने का भरोसा दिया।

ठीक छः महीने बाद अंतरिम सरकार के नेतृत्व में आम चुनाव हुआ और साल दो साल ही पुरानी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी भारी बढ़त के साथ सत्ता में आ गई। जैसा की पहले ही घोषित था कि सत्ता में आने के बाद काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह ही प्रधानमंत्री होंगे।
बालेन शाह चूंकि केपी शर्मा ओली को हराकर प्रतिनिधि सभा में पहुंचे थे इसलिए उन्हें लोग हीरो की तरह देख रहे थे। रैपर और इंजीनियर की उनकी पहचान तो थी ही। बहरहाल बालेन शाह सर्वथा पहली बार अब तक की सबसे बड़ी निर्वाचित पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री चुन लिए गए।

बालेन शाह नेपाल की जनता की दृष्टि में केवल प्रधानमंत्री ही नहीं थे, वे लोगों की उम्मीद और विश्वास की प्रतिमूर्ति थे। सबसे ज्यादा भरोसा उन परिवारों को था जिनके बच्चे इस आंदोलन में मारे गए थे। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद उन्होंने आंदोलन में मारे गए युवा और उनके परिवारों को न्याय का भरोसा दिया था।
अब जब हम प्रधानमंत्री के न्याय और भरोसे के वादे को देखेंगे तो इसमें निराशा और नाउम्मीदी ही दिखती है। जेन जी आंदोलन में 77 युवाओं की जान गई थी, इसमें 20 छात्र थे जिनकी जान प्रतिनिधि सभा परिसर में गई। सरकारी और गैर सरकारी संपत्तियों को भी भारी नुकसान हुआ था।

सरकारी आंकड़े पर ही भरोसा करे तो यह 84 अरब 45 करोड़ के आसपास है। जेन जी आंदोलन शहीद परिवार कल्याण समिति के अध्यक्ष नारायण श्रेष्ठ कहते हैं कि आंदोलन के समय जेन जी पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई बरती जा रही है। अत्याचार अथवा गोलीबारी के मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली को दोषी करार कर कार्रवाई की मांग की जा रही। इस संबंध में सरकार की ओर से कराई गई एक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत हुई जिसमें तत्कालीन सरकार और उसके उच्च अधिकारियों को कटघरे में खड़ा किया गया है लेकिन इनके खिलाफ कार्रवाई न होने से जेन जी असंतुष्ट हैं। नारायण श्रेष्ठ का कहना है कि आंदोलन में मारे गए और घायल युवाओं के परिजनों को स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की मांग पर सरकार गंभीर नहीं है।
नेपाली कांग्रेस की नेत्री रजनी थापा कहती हैं कि जेन जी आंदोलन से जन्मी बालेन शाह सरकार से संविधान संशोधन, शासन प्रणाली में बदलाव, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता, जेन जी युवा संगठन की बहाली आदि की उम्मीद थी लेकिन सरकार इस ओर से एक दम उदासीन है।

कपिलवस्तु जिले के बड़ा वार्ड अध्यक्ष तिलक बस्नेत कहते हैं कि इस सरकार में भ्रष्टाचार की उम्मीद नहीं थी लेकिन हैरत की बात यह है कि बालेन शाह सरकार के मंत्री ही इसमें लिप्त पाए गए।
हालांकि गृहमंत्री सुदन गुरूंग साफ कहते हैं कि, सरकार अपना कोई वादा भूली नहीं है, बहुत सारे काम हुए हैं, बहुत सारे बाकी है। वे कहते हैं कि सरकार युवाओं से किया एक एक वादा पूरा करेगी, अभी तो सिर्फ छः महीने हुए हैं, हमारे पास अभी काफी समय है।
पहले न अब अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की अपील
बालेन सरकार के छः महीने के कार्यकाल को आपदा काल की दृष्टि से भी देखा जा रहा है। सत्ता संभालते ही जेन जी आंदोलन में हुए 85 अरब की संपत्तियों के नुकसान की भरपाई आसान नहीं था, बालेन सरकार इस ओर तेजी से बढ़ रही थी कि भोटेकोशी की बाढ़ ने नेपाल को फिर उसी हाल में खड़ा कर दिया। इस आपदा में जन हानि की गिनती अभी पूरी नहीं हुई है, जल विद्युत परियोजनाओं का भारी नुकसान हुआ है। घर मकान, सड़क, पुल आदि जमींदोज हुए हैं। अभी तक के मूल्यांकन में तकरीबन 60 अरब के नुकसान की बात सामने आई है। नेपाल पहाड़ों से घिरा एक छोटा देश है लेकिन दुश्वारियां बड़े देशों से कम नहीं है।

जानकार कहते हैं कि बालेन सरकार प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ रही है लेकिन प्रकृति रोक रही है। भोटेकोशी बाढ़ आपदा नेपाल के आगे बढ़ने में बड़ी रुकावट है। बड़ा सवाल है कि आखिर बालेन शाह इन मुश्किलों से कैसे पार पाएगी?
खबर है कि 24 सितंबर को न्यूयार्क में होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81 वें सत्र में भाग लेने बालेन शाह स्वयं न्यूयार्क जा रहे हैं। इसके पहले इस कार्यक्रम में विदेश मंत्री शिशिर खनाल के जाने का कार्यक्रम था। हर साल होने वाले इस कार्यक्रम में विश्व भर के शीर्ष नेता शिरकत करते हैं। इस साल का यह कार्यक्रम ऐसे समय आयोजित है जब नेपाल विनाशकारी आपदा से जूझ रहा है और वह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार कर रहा है।
विदेश मंत्री शिशिर खनाल की जगह उक्त कार्यक्रम में बालेन शाह के खुद जाने के फैसले के पीछे बाढ़ से तबाह हुए तिब्बत सीमा के क्षेत्रों के पुनर्निर्माण हेतु अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की अपील करना है।
बता दें कि बालेन शाह ने रसुआ में आई आपदा के बाद अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से साफ मना कर दिया था। हालांकि 72 घंटे बाद ही उन्हें अपने फैसले पर पछतावा हुआ और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की मांग की। उसके बाद दुनिया के कई देश नेपाल की मदद में आगे आए। भारत अब तक 130 टन राहत सामग्री पहुंचा चुका है। भारत से तमाम संघ संस्थाओं और दान दाताओं द्वारा राहत सामग्री पहुंचाया जा रहा है।


