आनंद नगर में पूर्व चेयरमैन और वर्तमान चेयरमैन प्रतिनिधि में घमासान, एक तरफ करोड़ों के सवाल तो दूसरी ओर कागजी जांच की चुनौती

चेयरमैन प्रतिनिधि राजेश जायसवाल बोले—वीडियो पर बोलने से कुछ नहीं होता, कागज लेकर आइए, जांच के लिए तैयार हैं

पूर्व चेयरमैन विनोद गुप्ता ने सरोवर, पोखरा, नगर पंचायत गेट से लेकर सब्जी मंडी तक कई करोड़ों के कार्यों पर उठाए सवाल

विनोद गुप्ता का दावा—आज जांच हो जाए तो ईओ और चेयरमैन दोनों जाएंगे जेल; आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं

महराजगंज। आनंद नगर नगर पंचायत में विकास कार्यों को लेकर पूर्व चेयरमैन और वर्तमान चेयरमैन प्रतिनिधि के बीच आरोप-प्रत्यारोप का मामला गरमा गया है। पूर्व चेयरमैन विनोद कुमार गुप्ता ने मुख्यमंत्री शहरी योजना के तहत नगर पंचायत में आए करीब 18 से 20 करोड़ रुपये की धनराशि से कराए जा रहे कार्यों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने दुर्गा मंदिर सरोवर, पोखरा, नगर पंचायत के पुराने गेट, सब्जी मंडी समेत कई निर्माण कार्यों का जिक्र करते हुए कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।

वहीं वर्तमान चेयरमैन विजय लक्ष्मी जायसवाल के प्रतिनिधि राजेश जायसवाल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि केवल वीडियो में बयान देने से कोई आरोप साबित नहीं होता। उन्होंने आरोप लगाने वाले पक्ष से कागजात के साथ शिकायत करने और जांच कराने की बात कही है।

राजेश जायसवाल का कहना है कि यदि किसी कार्य में गड़बड़ी हुई है तो दस्तावेज सामने लाए जाएं और नियमानुसार नगर पंचायत से लेकर जिलाधिकारी तथा मंडलायुक्त स्तर तक जांच कराई जा सकती है।

दुर्गा मंदिर सरोवर पर दो करोड़ रुपये का सवाल

पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल दुर्गा मंदिर सरोवर को लेकर सामने आया है। पूर्व चेयरमैन विनोद गुप्ता का आरोप है कि उनके कार्यकाल में सरोवर का निर्माण कराया गया था और वह ठीक स्थिति में था। इसके बावजूद बाद में उसी स्थान पर जेसीबी चलाकर पुराने निर्माण को हटाया गया और दोबारा निर्माण के नाम पर करीब दो करोड़ रुपये खर्च किए जाने को लेकर सवाल खड़े हुए।

पूर्व चेयरमैन का सवाल है कि यदि सरोवर पहले से बना हुआ था तो उसे दोबारा तोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी? यदि दोबारा निर्माण जरूरी था तो इसकी तकनीकी जरूरत किस रिपोर्ट में बताई गई थी और इसके लिए कितनी धनराशि स्वीकृत की गई?

वहीं चेयरमैन प्रतिनिधि राजेश जायसवाल ने सरोवर पर डबल भुगतान और दोबारा काम कराने के आरोप को खारिज किया। उनका कहना है कि लंबे समय से वहां कोई काम नहीं हुआ है और लगाए जा रहे आरोपों का कोई आधार नहीं है।

पोखरा को लेकर भी पूर्व चेयरमैन के सवाल

विनोद गुप्ता ने पोखरा की सड़क और वहां पहले कराए गए कार्यों का भी जिक्र किया। उनका आरोप है कि करीब एक वर्ष पहले वहां लोगों के लिए दुकान और अन्य व्यवस्थाएं की गई थीं, लेकिन बाद में उसी क्षेत्र में दोबारा निर्माण कार्य कराए जाने को लेकर सवाल उठते हैं।

पूर्व चेयरमैन का कहना है कि यदि कोई कार्य पहले ही कराया जा चुका था तो उसे दोबारा कराने की जरूरत क्यों पड़ी और इस पर सरकारी धन का कितना भुगतान हुआ?

इन आरोपों पर राजेश जायसवाल ने कहा कि मौके पर लंबे समय से कोई काम नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि किसी कार्य के संबंध में कोई आपत्ति है तो उसका विवरण कागजात के साथ सामने रखा जाना चाहिए।

नगर पंचायत के पुराने गेट पर भी आमने-सामने

विवाद सिर्फ सरोवर और पोखरा तक सीमित नहीं है। पूर्व चेयरमैन ने नगर पंचायत के पुराने गेट को तोड़े जाने पर भी सवाल उठाए हैं।

राजेश जायसवाल ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि पुराना गेट काफी समय से जर्जर था और उसके गिरने से दुर्घटना की आशंका हो सकती थी। उनका कहना है कि नगर पंचायत कार्यालय और परिसर का आधुनिकीकरण किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि नगर पंचायत परिसर में हाट बाजार, डिवाइडर, लाइटिंग और शौचालय समेत कई विकास कार्य कराए जा रहे हैं। उनके अनुसार परिसर में पहले गंदगी और अव्यवस्था की स्थिति थी, जिसे अब बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

सब्जी मंडी के कार्य पर भी उठे सवाल

पूर्व चेयरमैन विनोद गुप्ता ने सब्जी मंडी क्षेत्र में हुए निर्माण को लेकर भी कथित डबल पेमेंट और दोबारा निर्माण का सवाल उठाया।

उनका कहना है कि जिस स्थान पर पहले निर्माण कराया गया था, वहां दोबारा कार्य कराए जाने की स्थिति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि पुराने कार्य की लागत क्या थी, नए कार्य के लिए कितनी धनराशि स्वीकृत हुई और भुगतान किस आधार पर किया गया।

राजेश जायसवाल ने इन आरोपों को भी खारिज करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में केवल मौखिक आरोप लगाने के बजाय लिखित शिकायत और दस्तावेजों के आधार पर जांच कराई जानी चाहिए।

18 से 20 करोड़ की मुख्यमंत्री शहरी योजना पर सवाल

पूर्व चेयरमैन विनोद गुप्ता ने दावा किया कि नगर पंचायत विस्तार के बाद मुख्यमंत्री शहरी योजना के तहत करीब 18 से 20 करोड़ रुपये की धनराशि आई है।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस धनराशि से होने वाले कार्यों में मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है और कई कार्यों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पूर्व चेयरमैन ने कहा कि जनता के पैसे से होने वाले प्रत्येक विकास कार्य का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नगर पंचायत में पहले कार्य कर चुके अधिकारियों के कार्यकाल से संबंधित कुछ शिकायतों और सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई रिपोर्ट पर भी कार्रवाई लंबित रही।

इसी बीच ठेकेदारों पर प्रशासनिक कार्रवाई भी चर्चा में

इसी बीच जिले के नगर निकायों में विकास कार्यों की समीक्षा के दौरान जिलाधिकारी गौरव सिंह सोगरवाल ने निर्माण कार्यों में देरी और गुणवत्ता को लेकर सख्त रुख अपनाया है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, आनंदनगर में मुख्यमंत्री नगर सृजन योजना के कार्यों में विलंब समेत विभिन्न निकायों के मामलों में कई ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने के निर्देश दिए गए हैं।

इसी संदर्भ में फरेंदा के ठेकेदार दूधनाथ शर्मा और कमलेश जायसवाल को ब्लैकलिस्ट किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध प्रशासनिक/मीडिया रिपोर्ट में इन दोनों नामों को लेकर अलग से विस्तृत आदेश सामने नहीं है। इसलिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी ठेकेदार के खिलाफ ब्लैकलिस्ट की कार्रवाई होना अपने आप में आनंद नगर के किसी विशेष कार्य में अनियमितता सिद्ध नहीं करता।

ऐसे में संबंधित आदेश, टेंडर, कार्यादेश, भुगतान अभिलेख और तकनीकी जांच के आधार पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इन ठेकेदारों से जुड़े कौन-कौन से कार्य प्रशासनिक कार्रवाई के दायरे में आए।

पूर्व चेयरमैन का बड़ा दावा

विनोद गुप्ता ने बातचीत के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कहा कि यदि पूरे मामले की तेजी से जांच करा दी जाए तो अधिशासी अधिकारी और चेयरमैन दोनों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है और वे जेल जा सकते हैं।

हालांकि, यह पूर्व चेयरमैन का आरोप और दावा है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि किसी जांच एजेंसी या सक्षम अधिकारी की रिपोर्ट से नहीं हुई है। किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण केवल जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।

राजेश जायसवाल बोले—“कागज लेकर आइए”

इन गंभीर आरोपों पर चेयरमैन प्रतिनिधि राजेश जायसवाल ने कहा कि “वीडियो पर बोलने से कुछ नहीं होता।” उनका कहना है कि यदि किसी कार्य में डबल भुगतान, अनियमितता या भ्रष्टाचार का आरोप है तो उसके समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएं।

उन्होंने कहा कि नगर पंचायत से संबंधित कागजात मांगे जा सकते हैं। यदि नगर पंचायत स्तर पर समाधान नहीं होता है तो जिलाधिकारी और मंडलायुक्त स्तर पर शिकायत की जा सकती है।

राजेश जायसवाल ने जांच के लिए तैयार होने की बात भी कही और कहा कि यदि किसी को लगता है कि कोई गड़बड़ी हुई है तो नियमानुसार लिखित शिकायत करके जांच कराई जाए।

धर्मशाला के 2 करोड़ 75 लाख रुपये पर भी सवाल

पूरे मामले में धर्मशाला निर्माण पर करीब 2 करोड़ 75 लाख रुपये खर्च होने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

सवाल यह है कि इस निर्माण की स्वीकृत लागत कितनी थी, वास्तविक भुगतान कितना हुआ, कार्य किस एजेंसी से कराया गया और कार्य की गुणवत्ता तथा भुगतान का सत्यापन किस स्तर पर हुआ।

इन सवालों का अंतिम जवाब संबंधित स्वीकृति पत्र, टेंडर, कार्यादेश, एमबी बुक, भुगतान विवरण और तकनीकी रिपोर्ट से ही स्पष्ट हो सकेगा।

अब जांच और दस्तावेजों पर टिकी निगाह

आनंद नगर में चल रहे इस विवाद में एक तरफ पूर्व चेयरमैन करोड़ों रुपये के विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं का आरोप लगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वर्तमान चेयरमैन प्रतिनिधि आरोपों को खारिज करते हुए दस्तावेजों के साथ जांच कराने की बात कह रहे हैं।

अब इस मामले में कई सवालों का जवाब सरकारी दस्तावेजों से तलाशना जरूरी होगा—

– दुर्गा मंदिर सरोवर की स्वीकृत लागत कितनी थी?

– पुराने निर्माण को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?

– नए निर्माण की तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर मिली?

– कितनी धनराशि स्वीकृत हुई और कितना भुगतान किया गया?

– धर्मशाला के लिए 2 करोड़ 75 लाख रुपये की धनराशि का पूरा विवरण क्या है?

– नगर पंचायत के पुराने गेट को हटाने और नए विकास कार्यों की स्वीकृति क्या थी?

– पोखरा और सब्जी मंडी के कार्यों में पहले और बाद के भुगतान का विवरण क्या है?

– संबंधित ठेकेदारों को जारी कार्यादेश और भुगतान का रिकॉर्ड क्या है?

इन सभी सवालों का जवाब टेंडर, कार्यादेश, एमबी बुक, भुगतान अभिलेख, तकनीकी स्वीकृति और मौके की जांच से सामने आ सकता है।

फिलहाल आनंद नगर में पूर्व चेयरमैन विनोद गुप्ता के आरोप और चेयरमैन प्रतिनिधि राजेश जायसवाल के जवाब ने विकास कार्यों को लेकर बहस तेज कर दी है। पूर्व चेयरमैन जांच की मांग कर रहे हैं, जबकि चेयरमैन प्रतिनिधि कागजों के आधार पर जांच कराने की बात कह रहे हैं।

अब सवाल सिर्फ आरोपों का नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट का है।

आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। संबंधित विभाग की जांच या आधिकारिक दस्तावेज सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी वास्तविकता है।

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