संसदीय शपथ पर संकट: कोर्ट में लंबित मामलों के कारण रवि लामिछाने का पद निलंबित
मनोज कुमार त्रिपाठी
प्रतिनिधि सभा चुनाव के तहत चितवन क्षेत्र नंबर–2 से निर्वाचित राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के सभापति रवि लामिछाने फिलहाल संसदीय भूमिका में शामिल नहीं हो पाएंगे। सहकारी ठगी के साथ-साथ संगठित अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग (सम्पत्ति शुद्धीकरण) के तीन गंभीर आरोपों के चलते वे सांसद चुने जाने के बावजूद निलंबन की स्थिति में रहेंगे।
वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी के अनुसार, चूंकि रवि लामिछाने के खिलाफ आपराधिक मामलों के तहत मनी लॉन्ड्रिंग और संगठित अपराध का मुकदमा अदालत में दर्ज है, इसलिए अंतिम फैसला आने तक वे सांसद पद की शपथ भी नहीं ले सकते। उनका कहना है कि यह नियम केवल लामिछाने पर ही नहीं बल्कि उन सभी जनप्रतिनिधियों पर लागू होता है जिन पर आपराधिक मामलों में भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर आरोपों के मुकदमे लंबित हों।
त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि सांसद पद का निलंबन होने का अर्थ यह नहीं है कि पद पूरी तरह समाप्त हो गया है। जब तक मामले का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक निलंबन की स्थिति बनी रहती है। यदि अदालत के अंतिम निर्णय में वे निर्दोष साबित होते हैं, तो उनका सांसद पद स्वतः बहाल हो जाएगा।
इससे पहले कास्की के स्वर्णलक्ष्मी सहकारी ठगी मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और संगठित अपराध के आरोप लगने के बाद तत्कालीन सभामुख देवराज घिमिरे ने रवि लामिछाने के निलंबन की सूचना जारी की थी। सम्पत्ति शुद्धीकरण निवारण अधिनियम की धारा 27 के अनुसार, जब तक मामला अदालत में लंबित रहता है, तब तक संबंधित कर्मचारी, पदाधिकारी या राष्ट्रसेवक स्वतः निलंबित माना जाता है।
हाल ही में लामिछाने ने आरोपपत्र में संशोधन की मांग करते हुए महान्यायाधिवक्ता कार्यालय में आवेदन दिया था। महान्यायाधिवक्ता सविता भण्डारी ने 30 पुस 2082 को कास्की, काठमांडू, रूपन्देही और पर्सा जिला अदालत में दायर मामलों में संगठित अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों को हटाने के लिए आरोपपत्र संशोधन का निर्णय लिया था। इस निर्णय में यह तर्क दिया गया था कि लामिछाने पर लगाए गए आरोप राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित हैं और बचतकर्ताओं के हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हालांकि, महान्यायाधिवक्ता कार्यालय के इस निर्णय के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी, कानून के छात्र आयुष बडाल और युवराज पौडेल ‘सफल’ ने सर्वोच्च अदालत में रिट याचिका दायर की। सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में महान्यायाधिवक्ता कार्यालय से लिखित जवाब मांगा है और मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है।
यदि अदालत अभियोजन संशोधन को मंजूरी दे देती है, तो रवि लामिछाने के लिए संसद में प्रवेश का रास्ता खुल सकता है। लेकिन अगर जिला अदालत संशोधन को अस्वीकार कर देती है, तो अंतिम फैसला आने तक वे संसद में शामिल नहीं हो पाएंगे।
अब सर्वोच्च अदालत को इस मामले में मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता की धारा 36 की व्याख्या भी करनी होगी। इस धारा के अनुसार, यदि अदालत में दर्ज मामले में बाद में नए प्रमाण सामने आते हैं, तो महान्यायाधिवक्ता की अनुमति से सरकारी वकील आरोपपत्र में संशोधन के लिए अदालत में आवेदन दे सकता है। हालांकि, सवाल यह भी उठ रहा है कि लामिछाने के मामले में ऐसा कौन-सा नया प्रमाण मिला है जिसके आधार पर आरोपपत्र संशोधित करने की पहल की गई।