अमर मणि ने ऐलान तो कर दिया पर चुनाव लड़ने में फंस रहा है कानूनी पेंच!

मधुमिता हत्याकांड में उम्रकैद की हो चुकी सजा 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

महराजगंज! पूर्व मंत्री और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में करीब 20 साल जेल की सजा काट चुके अमरमणि त्रिपाठी ने फरेंदा से चुनाव लड़ने का ऐलान कर महराजगंज की राजनीति गरमा दी है। उनके इस ऐलान के बाद राजनीतिक नफा-नुकसान को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

 

हालांकि, चुनाव लड़ने की उनकी राह आसान नहीं दिख रही है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, उनकी उम्मीदवारी में अड़चन आ सकती है। अमरमणि महराजगंज की दो विधानसभा सीटों पर सक्रिय हैं। फरेंदा से खुद चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं, जबकि नौतनवां से उनके बेटे अमन मणि के चुनाव लड़ने की चर्चा है।

कुछ दिन पहले फरेंदा विधानसभा क्षेत्र में पत्रकारों के सवाल पर अमरमणि ने कहा था-मैं लडूंगा यहां से… नौतनवां से मेरा बेटा लड़ेगा। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद महराजगंज ही नहीं, आसपास के जिलों में भी इसके राजनीतिक मायने निकाले जाने लगे।

2 साल से ज्यादा की सजा पर चुनाव लड़ने की रोक

कानून के मुताबिक, किसी व्यक्ति को किसी अपराध में दो साल से अधिक की सजा होती है तो जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता है। यह अयोग्यता सजा के दौरान और सजा पूरी होने के बाद भी निर्धारित अवधि तक लागू रहती है। हालांकि, ऊपरी अदालत से सजा पर रोक या सजा खत्म होने की स्थिति में कानूनी स्थिति बदल सकती है।

अमरमणि के मामले में कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि उनकी कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा पर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई है। सरकार की नीति के तहत उनकी शेष सजा माफ की गई है। इसलिए उनकी चुनावी पात्रता को लेकर कानूनी पेच बना हुआ है।

2007 में मिली थी उम्रकैद की सजा

मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में अमरमणि त्रिपाठी को अक्टूबर 2007 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उनकी पत्नी को भी इस मामले में सजा हुई थी। बाद में राज्य सरकार की 2018 की नीति के तहत अच्छे आचरण के आधार पर उम्रकैद की शेष अवधि माफ करने की प्रक्रिया अपनाई गई।

2023 में अमरमणि और उनकी पत्नी की

करीब 20 साल की सजा पूरी होनी थी। गिरफ्तारी से लेकर जेल में बिताए गए कुल समय को जोड़ें तो अमरमणि करीब 20 साल तक जेल में रहे। इसके बाद अच्छे आचरण के आधार पर उनकी बाकी सजा माफ कर दी गई और उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।

हालांकि, कानूनी जानकारों के मुताबिक, सरकार की ओर से शेष सजा माफ किया जाना और अदालत की ओर से दोषसिद्धि या सजा को खत्म किया जाना अलग-अलग बातें हैं। इसी वजह से उनकी चुनाव लड़ने की पात्रता पर सवाल उठ रहे हैं।

बता दें कि अमर मणि त्रिपाठी पहली बार साल 1981 में हुए उपचुनाव में महाराजगंज जिले की 190 लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से कम्युनिस्ट पार्टी रोजा देश पांडे गुट और कांग्रेस पार्टी के गठबंधन से चुनाव मैदान में उतरे थे। 19 हजार 289 वोट यानी 25.85 प्रतिशत वोट पाने में सफल रहे। इस चुनाव में पूर्वाचल के बाहुबली नेता माने जाने वाले वीरेंद्र प्रताप शाही ने 24 हजार 844 वोट पाकर जीतने में कामयाब रहे थे।

1985 में अमर मणि फिर निर्दल लड़े और 8426 वोट पाने में कामयाब रहे। इस बार भी वीरेंद्र प्रताप शाही निर्दल चुनाव जीतने में कामयाब रहे।

1989 अममणि तीसरी बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे। इस बार 29.95 प्रतिशत वोट पाकर पहली बार चुनाव जीतने में कामयाब रहे।

1991 में चौथी बार फिर लक्ष्मीपुर से अमरमणि मैदान में उतरे। इस बार उन्हें 25 हजार 636 वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर रहे और कुंवर अखिलेश सिंह से हार गए।

1993 में पांचवी बार मैदान में उतरे। इस बार पुनः अखिलेश सिंह से पराजित हुए।

1996 में छठवीं बार चुनाव लड़े। कांग्रेस के टिकट पर उन्हें जीत मिली और दूसरी बार विधायक बने।

2002 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत हासिल कर तीसरी बार विधायक बने।

21 सितंबर 2003 में मधुमिता शुक्ला हत्या कांड में गिरफ्तार कर लिए गए।

2007 में जेल में रहते हुए अमरमणि ने चुनाव लड़ा। इस बार वह सपा के प्रत्याशी थे। उन्हें जीत मिली और चौथी बार विधायक बने।

अक्टूबर 2007 में आजीवन कारावास की सजा मिली। 25 अगस्त 2023 को उन्हें जेल से रिहा किया गया।

2012 से 2022 के बीच अमरमणि के पुत्र अमन तीन बार नवगठित नौतनवां 316 विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े। 2017 में उन्हें जीत मिली। दो बार हार का सामना करना पड़ा।

चाचा को फांसी की सजा, बाद में 5 बार विधायक बने

अमरमणि त्रिपाठी के चाचा श्याम नारायण तिवारी का राजनीतिक सफर भी इसी वजह से चर्चा में है। साल 1968 में हुए एक हत्याकांड में अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।

श्याम नारायण ने राष्ट्रपति के समक्ष फांसी की सजा माफ करने की अपील की थी। राष्ट्रपति ने उनकी सजा माफ कर दी। इसके बाद वह फरेंदा सीट से पांच बार विधायक बने और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे।

हालांकि, अमरमणि के मामले में कानूनी स्थिति अलग है। यही वजह है कि उनके चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद राजनीतिक चर्चा के साथ-साथ उनकी कानूनी पात्रता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

अमरमणि व उनकी पत्नी की शेष सजा माफ कर दी गई। लेकिन इससे 2007 में कोर्ट द्वारा दिए गए आजीवन कारावास की सजा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। चूंकि इस मामले में अमरमणि को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से सजा पर कोई स्टे नहीं मिला है इसलिए वह चुनाव नहीं लड़ सकते।

अमर मणि त्रिपाठी की उम्मीदवारी का अंतिम फैसला चुनाव प्रक्रिया में संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर होगा।

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