उमेश चन्द्र त्रिपाठी
हां यह बिल्कुल सच है- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने सख्त न्यायिक गरिमा बनाए रखी। 1975 में ‘उत्तर प्रदेश बनाम राजनारायण’ केस की सुनवाई के दौरान, जब इंदिरा गांधी अदालत में गवाही देने पहुंची थीं, तो जस्टिस सिन्हा ने निर्देश दिया था कि अदालत में केवल न्यायाधीश के आने पर ही लोग खड़े होंगे, गवाह या किसी भी वीआईपी के आने पर किसी को खड़े होने
की जरूरत नहीं है और हुआ भी यही इंदिरा गांधी के कोर्ट के अंदर आने पर कोई खड़ा नहीं हुआ। इस बात को लेकर इंदिरा गांधी को काफी अपमानित होना पड़ा और उन्होंने 25 जून 1975 को आपातकाल लगाकर इसका बदला लिया।
इस प्रोटोकॉल के तहत, जब इंदिरा गांधी अदालत के अंदर आईं, तो जस्टिस सिन्हा ने उन्हें अपने आसन पर बैठकर केवल औपचारिकता के तौर पर रुकने का इशारा किया, ताकि अदालत में उन्हें झुककर ‘नमस्ते’ करने या किसी अन्य चाटुकारिता जैसी परंपराओं को रोका जा सके।
इसके बाद, 12 जून 1975 को दिए गए अपने साहसिक फैसले में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने चुनावी धांधली का दोषी पाते हुए इंदिरा गांधी का लोकसभा चुनाव रद्द कर दिया था और उन्हें 6 साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया था।