मनोज कुमार त्रिपाठी
महराजगंज। आधुनिक दौर में बढ़ते भौतिकवाद, दिखावे और रिश्तों में आती दूरियों को लेकर कवि मिलिंद गुप्ता ने अपनी कविता के माध्यम से समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया है। उनकी कविता आज के समय की उन सच्चाइयों को उजागर करती है, जहाँ दौलत और भौतिक सुख-सुविधाओं का महत्व तो बढ़ता जा रहा है, लेकिन इंसान और रिश्तों की कीमत लगातार कम होती जा रही है।
कवि लिखते हैं—
“कीमती होती जा रही है आज दौलत,
पर देखो, इंसान की अब कीमत कहाँ?
दिखावे के लिए घर तो बड़े हो गए,
मगर उन घरों में रिश्तों की अहमियत कहाँ?
गाड़ियाँ बड़ी और आलीशान हो गई,
पर पैदल साथ चलने वाली वो यारी कहाँ?
महंगे तोहफों से लोग दिल जीतना चाहते,
मगर वो निस्वार्थ जज्बात और वफादारी कहाँ?
ऐसा ही अजीब दौर चल रहा समाज का,
दिखावे के बिना यहाँ किसी का गुज़ारा कहाँ?
मशीन बन चुके हैं सब इस अंधी दौड़ में,
रुककर हाल पूछने का अब किसी के पास वक़्त कहाँ?
यूँ ही अगर भागते हुए कटनी है जिंदगी,
तो फिर ऐसे जीने में जीवन की रंगत कहाँ?
तन्हाई ही लिखी हो अगर बंद कमरों में,
तो फिर उस आलीशान महल में भी जन्नत कहाँ?
चलो लौट चलें फिर उसी सादगी की ओर,
जहाँ कश्ती कागज़ की थी, पर खुशियाँ अपार थीं।
दौलत से नहीं, अपनों के प्यार से नापो जीवन के मायने,
वही जिंदगी सच में सबसे सुंदर और शानदार थी।
तोड़ दें दिखावे की इन खोखली दीवारों को,
सहेजें उन्हें, जो दिल के सबसे पास हैं।
महलों का वैभव भी फीका है उस सुकून के आगे,
जहाँ अपनों के चेहरे पर सच्ची मुस्कान और विश्वास है।”
कवि की यह रचना समाज को यह संदेश देती है कि जीवन की वास्तविक खुशियाँ धन-दौलत या दिखावे में नहीं, बल्कि अपनेपन, प्रेम, विश्वास और सादगी में छिपी होती हैं। वर्तमान समय में जब लोग भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं, तब यह कविता मानवीय मूल्यों को संजोकर रखने की प्रेरणा देती है।
– By Milind Gupta