पांडवों से जुड़ा है नेपाल के डोलेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास 

नेपाल के देव स्थल भी दोनों देशों के बीच धार्मिक रिश्तों का कराते हैं एहसास

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

भारत नेपाल के रिश्ते केवल रोटी बेटी, रीति रिवाज और सांस्कृतिक सभ्यताओं तक ही सीमित नहीं है। यहां के देव स्थल भी दोनों देशों के बीच धार्मिक रिश्तों का एहसास कराते हैं। वे एक दूसरे को जोड़े रखने में सहायक भी हैं। काठमांडू सहित नेपाल के विभिन्न स्थानों पर स्थित ढेर सारे मंदिर और शिवालय हैं जो किसी न किसी रूप से भारत के देवस्थलों से जुड़े हुए हैं। पशुपतिनाथ और केदारनाथ के आपसी जुड़ाव को तो सभी जानते हैं, इसके इतर नेपाल में स्थित भगवान शिव के और भी मंदिर है जिनका जुड़ाव कहीं न कहीं भारतीय शिव मंदिरों से है।

केदारनाथ का मुखिया है डोलेश्वर महादेव मंदिर

काठमांडू वैली में ही एक स्थान है भक्तपुर। भक्तपुर काठमांडू वैली का ही एक शहर जो राजधानी से करीब 14 किमी उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है। यहां पहुंचने के लिए यदि अपना साधन न हो तो किराए की टैक्सी अथवा लोकल बस से आधे घंटे में पंहुचा जा सकता है। भक्तपुर के दक्षिण और पूरब कोने पर सिपडोल नामक कस्बे नुमा गांव है। इस गांव में शिव भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है क्योंकि इसी गांव में डोलेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। 

इस मंदिर की महत्ता इसलिए है क्योंकि यह भगवान शिव का ऐसा मंदिर है जिसे केदारनाथ का मुखिया कहा जाता है। हिंदू धर्म में इस मंदिर का इतिहास चार हजार वर्ष पूर्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ बताया जाता है। चांदी के तराशे हुए नागों से घिरे यहां के शिव लिंग दर्शनार्थियों में गजब की तेज का संचार करते हुए प्रतीत होते हैं। मंदिर में स्थापित महादेव बड़े से काले पत्थर का शिवलिंग है। 

बताते हैं कि इसके स्पर्श मात्र से ही भक्तजन अभिभूत हो जाते हैं। तन और मन स्वयं भगवान शंकर को समर्पित हो जाता है। यहां के शिव लिंग को केदारनाथ मंदिर के शिव लिंग का प्रमुख हिस्सा माना जाता है। 

काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर की भांति यहां के पुजारी भी दक्षिण भारतीय होते हैं। जिनके चयन की प्रक्रिया आसान नहीं है। ये पुजारी मुख्यतः कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश अथवा केरल के होते हैं।

पांडवों से क्रोधित भगवान शंकर ने धरा था बैल का रूप जैसे सभी प्रमुख देव स्थलों का अपना इतिहास और धार्मिक महत्व होता है वैसे ही डोलेश्वर महादेव मंदिर भी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से लैस है। इस मंदिर को लेकर किंवदंतियां अनेक है। इसी में एक यह भी कि महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने पाप से मुक्ति के लिए भगवान शंकर का दर्शन कर आशीर्वाद चाहते थे। 

भगवान शंकर की खोज में पांडव केदारनाथ पहुंच गए जहां उन्होंने देखा कि भगवान शंकर तो बैल के रूप में विराजमान हैं। कहते हैं कि भगवान शंकर पांडवों से क्रोधित थे इसलिए उन्होंने बैल का रूप धारण कर लिया था लेकिन पांडव जान गए थे कि यह भगवान शिव ही हैं। वे स्पर्श करने के उद्देश्य से बैल की पूंछ खींचने लगे तभी बैल के शरीर से सिर अलग होकर कहीं गुम हो गया। पांडव इसे ढूंढने में विफल रहे। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए तो उनके धड़ के ऊपर का हिस्सा डोलेश्वर में प्रकट हुआ। इसी आधार पर डोलेश्वर महादेव को केदारनाथ का प्रमुख हिस्सा बताया गया। कहते हैं कि केदारनाथ और डोलेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास चार हजार वर्ष पुराना है।

डोलेश्वर महादेव हैं केदारनाथ का सिर 

स्थानीय लोग इस प्राचीन शिव लिंग की पूजा करते रहे। केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी और धर्मगुरुओं ने धार्मिक ग्रंथों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर डोलेश्वर महादेव को केदारनाथ मंदिर का सिर घोषित किया। इसके बाद इस मंदिर की महत्ता कुछ इस तरह बढ़ी कि केदारनाथ की यात्रा तब तक अपूर्ण है जबतक डोलेश्वर महादेव का दर्शन नहीं हो जाता।

मन मोह लेती है मंदिर की शिल्पकारी

डोलेश्वर महादेव मंदिर की शिल्पकारी कुछ ऐसी है कि उसमें नेपाल की सांस्कृतिक और सभ्यता की झलक साफ दिखती है। मंदिर का निर्माण पारंपरिक नेवारी वास्तुकला जैसी की गई है। मंदिर निर्माण में लकड़ी की अद्भुत नक्काशी की गई है। पैगोडा शैली का आकर्षक डिजाइन हर किसी को लुभाता है। लकड़ी की नक्काशी, पौराणिक डिजाइन, नेवारी कलाकारी कुछ इस तरह की गई है कि मंदिर की धार्मिक और पौराणिक महत्ता जरा भी धूमिल न हो।

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