विवादों के बीच मोना मिश्रा की ताजपोशी

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

लखनऊ! यूपी कांग्रेस युनिट की नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा (मोना) के पद भार ग्रहण करने के दिन प्रदेश कांग्रेस कार्यालय माल एवेन्यू (लखनऊ) में विवाद का जो दृश्य देखने को मिला वह कत्तई अचंभित करने वाला नहीं था। देखा जाए तो यह कांग्रेस की परंपरा है। हैरत इस बात की है कि यूपी कांग्रेस में यह दृश्य दशकों बाद देखने को मिला।

नवंबर 2004 में भी कांग्रेसियों में ऐसी घटना देखने को मिली थी जब विधानसभा उपचुनाव में खराब प्रदर्शन के कारण तत्कालीन यूपी कांग्रेस अध्यक्ष जगदंबिका पाल को हटाकर सलमान खुर्शीद को कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने का निर्णय लिया गया था। 

हालांकि यह घटना थोड़ी वीभत्स थी। घटना स्थल वही था, माल एवेन्यू ! दोनों समर्थकों के बीच हुई हाथापाई हजरतगंज तक पहुंच गया था जहां ईंट पत्थर तक चले थे। 

हजरतगंज में ही अशोक मार्ग पर जगदंबिका पाल का आवास है जहां उनके समर्थक इकट्ठा हुए थे। भारी अफरातफरी के बीच सात नवंबर 2004 को सलमान खुर्शीद यूपी कांग्रेस चीफ की कुर्सी संभाल पाए थे।

मोना मिश्रा की ताजपोशी के वक्त घटित घटना के पीछे लखनऊ की ममता चौधरी नामक किसी पार्षद का नाम आया है। हालांकि बाद में उनका संक्षिप्त बयान आया कि घटना कैसे हुई, उन्हें नहीं पता लेकिन उन्होंने निवर्तमान अध्यक्ष अजय राय पर तोहमत जरूर मढ़ दिया कि उन्होंने कहा कि तुम्हारी औकात क्या है? आदि आदि ! जगदंबिका पाल के वक्त की घटित घटना पर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व खामोश रहा और इस ताजा घटना पर भी कांग्रेस नेतृत्व अभी तक खामोश है। आगे भी शायद खामोश ही रहे। यूपी में चूंकि कुछ माह के भीतर विधानसभा के चुनाव हैं इसलिए उसकी खामोशी ही बेहतर है।

लेकिन इस घटना ने यूपी के जनमानस में ‘खासकर उन्हें जिनको कांग्रेस से कुछ उम्मीद है, एक सवाल पैदा कर ही दिया कि ये कांग्रेसी जब आपस में ही लड़ रहे हैं तो भाजपा से क्या लड़ेंगे?

अजय राय वाराणसी के कद्दावर नेता हैं। वे भाजपा से कांग्रेस में आए हैं। वाराणसी के पिंडारा विधानसभा क्षेत्र से कई बार के विधायक रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर उनकी चर्चा तब हुई जब 2024 में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को कड़ी टक्कर दी थी।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की निगाह में अजय राय का कद काफी बढ़ गया। संभवतः उसके बाद ही उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने का निर्णय लिया गया। बहरहाल वे तीन साल तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे जो एक लंबा कार्यकाल माना जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि बिना संपूर्ण संगठन के उन्होंने अध्यक्ष पद की अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया, हर जरूरी वक्त पर पूरे प्रदेश में उनकी उपस्थिति बनी रही।

सवाल उठता है कि अजय राय को बदल कर मोना मिश्रा की ताजपोशी का फैसला अचानक हुआ या यह किसी सोची समझी रणनीति का हिस्सा था? और क्या इस अदला बदली में अजय राय की सहमति थी? यदि कांग्रेस नेतृत्व ने सहमति और सूझबूझ से यह निर्णय लिया है तो ठीक है और यदि अजय राय को न पसंद करने वाले पार्टी के किसी नेता के बहकावे में ऐसा किया गया तो यकीन मानिए कांग्रेस की यह भारी भूल है। अजय राय के बदले मोना मिश्रा ! यह कोई जातीय अंकगणित भी नहीं है। बस इतना कि पुरुष के बदले महिला !

मोना मिश्रा प्रतापगढ़ जिले के रामपुर खास विधानसभा क्षेत्र से तीन बार की विधायक हैं। इससे बड़ी बात यह है कि वे इसी क्षेत्र से लगातार नौ बार विधायक रहे वर्तमान राज्य सभा सदस्य प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। प्रमोद तिवारी इसके पहले कांग्रेस में रहते हुए सपा से भी राज्य सभा सदस्य रहे हैं। जाहिर उनके सपा प्रमुख अखिलेश यादव से गहरे ताल्लुकात हैं। 

यूपी में सपा और कांग्रेस गठबंधन के चुनाव लड़ने की चर्चा के बीच कांग्रेस हाईकमान के मोना मिश्रा के चयन को महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इसके इतर वे खास ब्राह्मण चेहरा की बेटी तो हैं ही।

मोना मिश्रा के साथ पार्टी हाईकमान ने सहारनपुर के अपने बड़बोले सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया है। साथ ही दो उपाध्यक्ष भी नियुक्त किए गए हैं, दोनों ही गोरखपुर क्षेत्र से‌ ताल्लुक रखते हैं। एक निषाद समाज से हैं दूसरे दलित समाज से। स्टेट संगठन में पदाधिकारियों के चयन में जातीय समीकरण पर जरूर ध्यान दिया गया है लेकिन क्या अध्यक्ष सहित इस कमेटी में नामित सभी पदाधिकारी पार्टी हाईकमान की अपेक्षा पर खरा उतर पाएंगे?

उपाध्यक्ष बनाए गए गोरखपुर के देवेंद्र निषाद की नियुक्ति के पीछे पूर्वांचल के निषाद वोटों को साधना है जबकि इसी मंडल के महराजगंज जिले के रहने वाले दलित नेता आलोक प्रसाद की नियुक्ति के पीछे दलित वोटों को अपनी ओर आकर्षित करना है। भाजपा के सहयोगी निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद भी गोरखपुर के हैं। वे इस समय योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। यहां के निषाद उन्हें ही अपना नेता मानते हैं। पूर्वांचल के जिलों में उनका संगठन काफी सक्रिय है। ऐसे में कांग्रेस के देवेंद्र निषाद पार्टी को क्या फायदा पहुंचा पाएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। 

महराजगंज जिले के जिस आलोक प्रसाद को दूसरा उपाध्यक्ष बनाया गया है, उनकी खास पहचान यह है कि वे कांग्रेस के जमाने में राज्यपाल रहे सुखदेव प्रसाद के लड़के हैं। आलोक प्रसाद इसके पहले संगठन के दलित विभाग के चेयरमैन रह चुके हैं। वे सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र महराजगंज सदर से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ चुके हैं लेकिन सम्मान जनक वोट तक हासिल करने में विफल रहे हैं। 

आलोक प्रसाद को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाने से एक चर्चा यह भी है कि जब यूपी प्रभारी राजेन्द्र पाल गौतम के रूप में एक बड़ा दलित चेहरा पहले से मौजूद हैं तो फिर दूसरे दलित को उपाध्यक्ष बनाने का क्या मतलब? बेहतर होता पिछड़े वर्ग से किसी को इस पद पर बैठाया गया होता।

नई प्रदेश अध्यक्ष मोना मिश्रा को उनके पिता प्रमोद तिवारी के अनुभवों का लाभ मिल सकता है। जहां तक उनके ब्राम्हण समाज में प्रभाव की बात है तो यह उनके अपने विधानसभा क्षेत्र से बाहर देखने को नहीं मिला। चूंकि प्रमोद तिवारी का संबंध सपा मुखिया अखिलेश से भी है इसलिए मुमकिन है सीट शेयरिंग में उनकी कोई भूमिका काम कर जाय। 

सपा और कांग्रेस में गलबहियां के बीच इमरान मसूद की बयानबाजी कांग्रेस को असहज करती रहती है। मुमकिन है अब कांग्रेस की ओर से अनर्गल बयान बाजी थम जाय।

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