उमेश चन्द्र त्रिपाठी
नई दिल्ली! इन दिनों देश का संसद सत्र चल रहा है। सदन के बाहर आपको दो लड़कों की जोड़ी खूब जुगलबंदी करते हुए दिख रही होगी। सरकार को घेरना का एक भी मौका पूरे विपक्ष में इन दों लड़कों की जोड़ी छोड़ नहीं रही है। आप समझ गये होंगे। यह जोड़ी है कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की। जब पूरे देश और खास कर उत्तर प्रदेश की जनता इन दोनों को विपक्ष की पूरी कमान संभाले देखती है। तो एक सवाल बरबस ही उपज जाता है कि क्या उत्तर प्रदेश के आने वाले विधानसभा चुनाव में इन दो लड़कों की कैमिस्ट्री फिर दिखायी देगी या नहीं। सवाल भले ही सियासी हो और इसका उत्तर आसान दिख रहा हो लेकिन जमीन पर पड़ताल करेंगे तो इन दोनों की जितनी अच्छी कैमिस्ट्री दिल्ली में दिखायी देती है वह उत्तर प्रदेश में भाजपा की उर्वर
जमीन पर कितनी टिकेगी, यह बड़ा ही सवाल है।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के अब बस गिनती के महीने बचे हैं। कुल मिलाकर कहें तो ज्यादा से ज्यादा चार महीने। इन चार महीनों में यह तय होगा कि अगली सरकार किसकी बनेगी। एक तरफ सूबे में सत्तारूढ़ दल भाजपा है जिसके मुखिया योगी आदित्यनाथ हैं, वह अभी चुनाव नहीं शुरू हुआ लेकिन लगभग पूरा उत्तर प्रदेश मथ चुके हैं। वह एक-एक दिन में दो-दो विधानसभा क्षेत्रों में जाकर सरकारी योजनाओं की सौगात सौंप रहे हैं। तो वहां की सियासी जमीन पर अपनी अटेंडेंस लगाकर वहां की जनता को यह बता भी रहे हैं कि आप तीसरी बार भाजपा सरकार बनाने के लिए तैयार रहें। दूसरी तरफ पूरा विपक्ष का केंद्र बनी समाजवादी पार्टी है जिसके सिर पर ऐसी दिग्गज पार्टी से मुकाबले का दारोमदार है और इसमें उसकी सबसे बड़ी सहयोगी कांग्रेस और सबसे बड़ी बाधा भी कांग्रेस है। एक तरफ कांग्रेस नेता इमरान मसूद हैं जो हर रोज सपा को ललकार रहे हैं। ऐसे में यह सवाल बड़ा हो जाता है कि क्या उत्तर प्रदेश में आगे आने वाले समय में कांग्रेस और सपा का गठबंधन हो पायेगा या नहीं।
भाजपा ने पिछले दिनों गुपचुप अपने सर्वे में जानने की कोशिश की कि उसकी असलियत क्या है तो उसके हाथ जो आंकड़ा लगा उसके मुताबिक भाजपा को तकरीबन 50 सीटों का मोटा-मोटा नुकसान हो सकता है।
हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस सर्वे से सहमत नहीं हैं वह अपनी टीम से अलग सर्वे करा रहे है। लेकिन वह चुनाव के शुरुआत तक इन 50 सीटों पर सबसे अधिक फोकस कर रहे हैं। बीते 2024 के लोकसभा चुनाव में देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों ने सभी को चौंका दिया था।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि चौंकाने वाले उन नतीजों के पीछे प्रदेश के दो लड़के, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जोड़ी का बड़ा हाथ था। तभी तो यूपी के इन दो लड़कों के साथ आने के बाद इंडिया ब्लॉक के इस गठबंधन ने राज्य की 80 में से 43 लोकसभा सीटों पर परचम लहराकर भारतीय जनता पार्टी के एक दशक पुराने दबदबे को करारा झटका दिया।
हालांकि वो समय 2024 का था और नतीजे लोकसभा चुनाव के। खैर, अब समय 2026 का है और सभी की नजरे अगले साल यानी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर हैं।
सवाल जवाब और सीट बंटवारे को लेकर बड़े दिल की बात इसलिए भी हो रही है, क्योंकि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एक बार फिर साथ दिख रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठ रहा है। कि असली चुनावी लड़ाई शुरू होने से पहले सीट-बंटवारे की खींचतान में ‘बड़ा दिल’ कौन दिखाएगा?
इस पूरे खींचतान की शुरुआत 2024 चुनाव के बाद हुई एक बैठक से मानी जा सकती है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस को सलाह दी थी कि क्षेत्रीय दलों के दबदबे वाले राज्यों में राष्ट्रीय पार्टी को बड़ा दिल दिखाना चाहिए और लचीला रुख अपनाना चाहिए।
जवाब में राहुल गांधी ने भी साफ किया था कि उनका मकसद सहयोगियों से लड़ना नहीं, बल्कि साथ मिलकर काम करना है। लेकिन जमीनी स्तर पर यूपी कांग्रेस के कई स्थानीय नेता इससे अलग रुख अपना रहे हैं।
राजनीति ऊहापोह और सवाल जवाब के बीच अब कांग्रेस का दावा सामने आया। कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेता अब ‘समानता और सम्मान’ के आधार पर 50-50 फीसदी सीटों की हिस्सेदारी की मांग उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि 2024 में सपा को जो बड़ी बढ़त मिली, उसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय जनाधार और राहुल गांधी की छवि का अहम योगदान था।
हालांकि समाजवादी पार्टी का मानना है कि चूंकि वे राज्य में मुख्य विपक्षी दल हैं और 2027 में सरकार बनाने की मुख्य दावेदार हैं, इसलिए ज्यादा सीटों पर उनका लड़ना ही व्यावहारिक होगा।
इस बात को ऐसे समझिए कि कांग्रेस और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच सीट-बंटवारे को लेकर तालमेल की कमी कोई नई बात नहीं है। हाल के दिनों में कई राज्यों में इसके नकारात्मक परिणाम देखे गए हैं। उदाहरण के तौर पर हरियाणा में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बातचीत बेनतीजा रही।
अलग-अलग चुनाव लड़ने से विपक्षी वोट बंट गए और भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रही। इसके बाद बिहार में राजद और कांग्रेस के बीच सहमति बनने में हुई देरी ने ‘महागठबंधन’ की चुनावी तैयारियों को प्रभावित किया। इसके अलावा मध्य प्रदेश भी कुछ ऐसा ही हाल रहा। पिछले विधानसभा चुनाव में कमलनाथ और अखिलेश यादव के बीच हुई जुबानी जंग ने गठबंधन की संभावनाओं को बड़ा झटका दिया था, जिसे बाद में केंद्रीय नेतृत्व के दखल से संभाला गया।
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गणित को देखें तो दोनों दलों के अपने-अपने तर्क हैं। 2022 विधानसभा चुनाव में सपा 47 सीटों (2017) से बढ़कर मजबूत स्थिति में आई। जबकि कांग्रेस 399 सीटों पर लड़कर केवल दो सीटें जीती। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा 37 सीटें जीतकर राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनी। जबकि कांग्रेस ने छह सीटें हासिल की, जो पिछले चुनावों से बेहतर प्रदर्शन है।
उत्तर प्रदेश में आपसी मतभेद समाजवादी और कांग्रेस के लिए चुनौती इसलिए भी बना जाएगा, क्योंकि प्रदेश में भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विकल्प पेश करने के लिए दोनों दलों को एक व्यावहारिक समझौते पर पहुंचना होगा।
अगर सीट-बंटवारे को लेकर सार्वजनिक रूप से तल्खी बढ़ती है, तो इससे मतदाताओं के बीच मतभेद का संदेश जा सकता है। जैसा कि बिहार या हरियाणा में देखने को मिला था। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश में 2027 की बाजी वही जीतेगा जो चुनावी जंग शुरू होने से पहले अपने सहयोगी को साधने में बड़ा दिल दिखा पाएगा।