मनोज कुमार त्रिपाठी
महराजगंज। भारत-नेपाल के सोनौली बॉर्डर पर तस्करी को लेकर समय-समय पर सामने आने वाली बरामदगी की खबरें एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं। बताया जाता है कि नेपाल में अलग-अलग मामलों में हर सप्ताह लाखों रुपये कीमत के कथित तस्करी के सामान की बरामदगी होती है। इनमें कॉस्मेटिक समेत विभिन्न सामान, नकदी, कथित जाली नोट और हवाला से जुड़ी रकम के आरोप भी सामने आते रहे हैं।
सवाल सीधा है—अगर सीमा पार लगातार इतनी बड़ी बरामदगी की खबरें सामने आती हैं, तो यह सामान भारत से नेपाल तक पहुंच कैसे रहा है?
कार, बस और टेंपो ट्रैवलर में छिपाकर ले जाने की आशंका
सीमा पार सामान पहुंचाने के संभावित तरीकों में प्राइवेट कार, बस और टेंपो ट्रैवलर भी जांच के दायरे में आने चाहिए। सवाल यह है कि क्या कुछ वाहनों में सामान्य स्टोरेज स्पेस के अलावा गुप्त कैविटी या छिपे हुए स्थान बनाकर सामान अथवा नकदी ले जाने की कोशिश की जा सकती है?
ऐसी स्थिति में केवल सामान्य वाहन जांच पर्याप्त होगी या नहीं, यह भी विचारणीय विषय है। वाहनों के अंदर बने अतिरिक्त या असामान्य हिस्सों की जांच, संदिग्ध बदलावों की पहचान और बार-बार सीमा पार करने वाले वाहनों की गतिविधियों पर निगरानी तस्करी रोकने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, किसी वाहन या वाहन मालिक को तस्करी में शामिल बताने के लिए ठोस जांच और आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। यह विषय सुरक्षा एजेंसियों की जांच और निगरानी के दायरे में ही देखा जाना चाहिए।
असली सवाल—सप्लाई लाइन कहां है?
अगर अलग-अलग मामलों में लाखों रुपये के कथित तस्करी के सामान की बरामदगी सामने आती है, तो जांच सिर्फ बरामद सामान तक सीमित न रहकर यह पता लगाने पर भी होनी चाहिए कि माल कहां से आता है, सीमा तक किस माध्यम से पहुंचता है और इसके पीछे कौन-सा नेटवर्क सक्रिय है।


क्या प्राइवेट कारों, बसों और टेंपो ट्रैवलर में बने संभावित छिपे स्थानों की पर्याप्त जांच हो रही है?
क्या संदिग्ध वाहनों की आवाजाही का पैटर्न खंगाला जा रहा है?
और सबसे अहम—
अगर कुछ खेप पकड़ी जा रही हैं, तो क्या उससे पहले कुछ खेप निगरानी से बचकर सीमा पार कर रही हैं?
सोनौली जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सीमा मार्ग पर इन सवालों की गंभीरता से जांच और प्रभावी निगरानी जरूरी है, ताकि तस्करी की किसी भी संभावित कोशिश को सीमा पार करने से पहले रोका जा सके।
