यूपी पुलिस के हाफ एनकाउंटर पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी 

पुलिस की हर गोली घुटने के नीचे ही कैसे लगती है हॉफ एनकाउंटर पर हाईकोर्ट का सवाल

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

लखनऊ! उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में हुए कथित हॉफ एनकाउंटर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सीबीआई जांच के आदेश दिया है। साथ ही हाईकोर्ट ने पुलिस की कहानी को प्रथम दृष्टया गलत माना है। हाईकोर्ट ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर में कई गंभीर भी विसंगतियां हैं। प्रथम दृष्टया थाना प्रभारी द्वारा घटना का गलत विवरण प्रस्तुत किया गया प्रतीत होता है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सीबीआई को जांच पूरी कर रिपोर्ट यथा संभव 3 महीने में पेश करने को कहा है।

थाना प्रभारी की निशानेबाजी क्षमता की भी होगी जांच

हाईकोर्ट लखनऊ बेंच ने अलाउद्दीन उर्फ छोटकऊ की ओर से दाखिल अपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है। 

श्रावस्ती के इकौना थाना में बीएनएस की धारा 109 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत दर्ज एफआईआर की सत्यता की जांच करने का निर्देश सीबीआई को दिया है। 

हाईकोर्ट ने थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की निशानेबाजी क्षमता की भी जांच करने को कहा है। इसमें यह देखा जाएगा कि क्या वह रात में करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनकर 9 एमएम सर्विस पिस्टल से सटीक निशाना लगा सकते हैं कि नहीं, साथ ही 9 एमएम की गोली से मेडिकल रिपोर्ट में बताए गए घावों के आकार को लेकर थाना प्रभारी के स्पष्टीकरण पर भी कोर्ट ने सवाल किया।

एफआईआर में पुलिसकर्मियों की संख्या पर उठा सवाल

मामला उस कथित हॉफ एनकाउंटर से जुड़ा है, जिसमें अलाउद्दीन के दोनों पैरों में गोली लगी थी। पुलिस का दावा था कि अलाउद्दीन ने 23 सदस्यीय पुलिस टीम पर फायरिंग की थी।

थाना प्रभारी के मुताबिक हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनने के बाद आत्मरक्षा में उन्होंने दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगी। अलाउद्दीन के अधिवक्ता ने पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते हुए कहा कि एफआईआर के अनुसार 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे और बाद में तीन टीमों में बंट गए,जबकि किसी अन्य वाहन का जिक्र फर्द में नहीं है। इसके बाद 10 सदस्यीय स्वॉट टीम भी मौके पर पहुंची और पुलिसकर्मियों की कुल संख्या 23 हो गई।

कोर्ट ने अलाउद्दीन के इकबालिया बयान पर उठाया सवाल

अधिवक्ता ने सवाल उठाया की 10 स्वॉट कर्मियों समेत 23 सशस्त्र पुलिसकर्मी एक ई रिक्शा पर सवार व्यक्ति को रोकने में कैसे असफल रहे। ये भी कहा गया कि यह बात समझ से परे है कि पुलिस टीम कथित रूप से एक देसी तमंचा और केवल दो कारतूस रखने वाले व्यक्ति से निपटने के लिए छिप गई और अतिरिक्त बल बुलाया गया।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गोली लगने के बाद अलाउद्दीन से कथित रूप से कराए गए इकबालिया बयान पर भी सवाल उठाए। 7 वर्षीय बच्ची के अपहरण से संबंधित मूल घटना के 61 मिनट के भीतर एफआईआर दर्ज हो गई थी। लेकिन उसमें दुष्कर्म, रक्त स्राव या बच्ची के घायल होने का कोई जिक्र नहीं था।

कोर्ट ने कहा- पुलिस ने झूठा इकबालिया बयान दर्ज किया 

हाईकोर्ट ने कहा कि यह बातें बाद में कथित इकबालिया बयान में सामने आई। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि पुलिस ने संभवत झूठा इकबालिया बयान दर्ज किया। कोर्ट ने जिक्र किया कि मुठभेड़ में शामिल सभी 23 पुलिस कर्मियों को अच्छे कार्य के लिए पुरस्कृत किया गया था। इनमें उसे अपराध के संबंध में आरोपी से कथित इकबालिया बयान हासिल करना भी शामिल था। जिसमें पहले ही अलाउद्दीन को बरी किया जा चुका था।

मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी

पुलिस मुठभेड़ की जांच के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में गंभीर चोट वाले पुलिस मुठभेड़ मामलों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया का प्रथम दृष्टया पालन नहीं किया गया।

प्रमोशन के लिए कार्रवाई 

अदालत ने तंज कसा कि सिर्फ आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन या सीनियर अधिकारियों को खुश करने के लिए आरोपियों को पैर में गोली मारना खतरनाक और गलत प्रवृत्ति है।

हाईकोर्ट ने याची को राहत देते हुए श्रावस्ती की सेशन कोर्ट के 2 जुलाई के उस आदेश के क्रियान्वयन पर भी रोक लगा दी, जिसमें अलाउद्दीन की डिस्चार्ज अर्जी खारिज की गई थी। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *