पंडित कमलापति त्रिपाठी में कांग्रेस पार्टी के प्रति थी अटूट निष्ठा और विश्वास
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
काशी के घाट पर सुबह होते ही जब एक नौजवान तिलक लगाकर, धोती लपेटकर गंगा जी को नमन करता था, तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि शुद्ध रूप से ग्रामीण अंचल का यह लाल एक दिन लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की गद्दी हिला देगा।
नाम था पंडित कमलापति त्रिपाठी
ये उस जमाने की बात है जब राजनीति में गाड़ी-घोड़ा और छल-बल नहीं, बल्कि जुबान की कीमत होती थी, जब कांग्रेस बहुत मजबूत हुआ करती थी, गांव में सरपंच/प्रधान से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक सिर्फ कांग्रेस का ही झंडा ही झंडा हुआ करता था।
उस दौर में पंडित कमलापति त्रिपाठी जी कांग्रेस के सबसे नामचीन, प्रभावशाली और इंदिरा गांधी जी के सबसे विश्वसनीय सहयोगियों में गिने जाते थे।
चंदौली, वाराणसी, अविभाजित (मिर्जापुर, सोनभद्र, भदोही) से लेकर गाजीपुर, बलिया, जौनपुर इत्यादि जिलों में ब्राह्मण परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में पंडित जी का बहुत बड़ा योगदान हुआ।
पंडित जी अपने सहयोगियों को गुलाब जामुन और समोसा खिलाने तक सीमित नहीं रखते थे, उन्हें मजबूत बनाने के लिए ठेकेदार से लेकर मास्टर, मैनेजर, सिपाही, दरोगा, बड़े बाबू जैसे पदों पर अनगिनत ब्राह्मणों को बैठाया।
लखनऊ में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर भी उनके अंदर का ठेठ देहातीपन कभी नहीं मरा। पान का बीड़ा मुंह में दबाए, सादे कुर्ते में जब वो फाइलें देखते, तो बड़े-बड़े अफसरों के पसीने छूट जाते थे लेकिन पंडित जी की कहानी सिर्फ लखनऊ तक रुकने वाली नहीं थी।
फिर दिल्ली से इंदिरा गांधी जी का बुलावा आया
स्वतंत्रता संग्राम की भट्टी में तपकर निकले पंडित जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मजबूत स्तंभ रहे कमलापति त्रिपाठी जी की पहचान एक ऐसे जननेता की थी, जिनकी पकड़ जमीन से कभी ढीली नहीं हुई। वो चार बार सांसद बनकर, दिल्ली में मजबूत पैठ जमा चुके थे।
रेलमंत्री, परिवहन मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, नेता विपक्ष और न जाने कितने पदो पर रखकर नाम और शोहरत कमाने वाले पंडित जी के जीवन में भी वो दौर आया जब उन्हें प्रधानमंत्री बनने का ऑफर मिला।
दरअसल मार्च 1987 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच डाक विधेयक और अन्य मुद्दों पर भारी मतभेद हो गए थे तब ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी सरकार को बर्खास्त कर पंडित कमलापति त्रिपाठी के नेतृत्व में वैकल्पिक सरकार बनाने और उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश अपने दूत के जरिए भेजी थी, हालांकि, पंडित कमलापति त्रिपाठी ने कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा के कारण पीएम बनने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
अब सत्ता हाथ से छूट गई और पार्टी हार गई,
लेकिन पंडित जी डिगे नहीं, राज्यसभा में विपक्ष के बेबाक नेता बनकर शेर की तरह दहाड़ते रहे, बतौर नेता विपक्ष हमेशा संसदीय मर्यादाओं में उन्होंने सरकार की गलत नीतियों का जमकर विरोध किया,सत्ता ने कोई भी आए जाये लेकिन ब्राह्मणों का जो हित पंडित कमलापति त्रिपाठी जी कर गए, जो कोई न कर पाया है, न कोई कर पाएगा?





