उमेश चन्द्र त्रिपाठी
काठमांडू! सामाजिक अभियंता एवं पूर्व सचिव भीम उपाध्याय ने भावी प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के शपथ ग्रहण समारोह में किए जाने वाले वैदिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों का विरोध करने वालों को कड़ा जवाब दिया है।
उपाध्याय का कहना है कि बालेन द्वारा कराए जाने वाला स्वस्ति वाचन और सनातनी शैली में शपथ ग्रहण, वास्तव में नेपाल के संविधान का पालन करने का प्रमाण है।
भीम उपाध्याय ने नेपाल के संविधान की धारा 4 का हवाला देते हुए ‘धर्मनिरपेक्षता’ की परिभाषा स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ का अर्थ सनातन काल से चली आ रही धर्म-संस्कृति की रक्षा तथा धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की सुरक्षा से है। उनके अनुसार, बालेन द्वारा किया जा रहा कार्य इसी संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा और संरक्षण है।
शपथ ग्रहण की शैली को लेकर आलोचना करने वालों को उपाध्याय ने ‘विदेशी एनजीओ का भाड़े का एजेंट’ बताया। उन्होंने टिप्पणी की कि बालेन के इस कदम से विदेशी हितों पर चलने वालों की “आर्थिक स्रोत” खत्म होने वाली है और इसी कारण उनमें बेचैनी शुरू हो गई है। उन्होंने लिखा, “भाड़े के लोग बालेन के प्रधानमंत्री पद की वैदिक सनातनी शैली में शपथ ग्रहण की खबर सुनकर घबरा रहे हैं। विदेशी एनजीओ के एजेंटों की कमाई का स्रोत अब पूरी तरह सूखने जा रहा है। उनका घर-चूल्हा बंद होने वाला है और अब वे रोने-धोने पर उतर आएंगे।”
उपाध्याय ने बालेन के शपथ ग्रहण को केवल एक औपचारिक समारोह नहीं, बल्कि नेपाल के “पुनर्जागरण” की शुरुआत बताया। उन्होंने लिखा कि जिनकी जड़ें नेपाल की मिट्टी में हैं, वे इस खबर से अत्यंत खुश हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति का सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा करना उसका संवैधानिक कर्तव्य है।
उपाध्याय का विश्लेषण है कि बालेन स्वस्ति वाचन के माध्यम से कोई नया कार्य नहीं कर रहे, बल्कि संविधान द्वारा सौंपे गए धर्म और संस्कृति संरक्षण के दायित्व को ही निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि चाहे कोई कम्युनिस्ट हो या गैर-कम्युनिस्ट, संविधान की इस भावना का पालन करना अनिवार्य है।
यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब प्रधानमंत्री बालेन के शपथ ग्रहण में 108 बटुकों और बौद्ध लामाओं द्वारा मंत्रोच्चारण किए जाने को लेकर बौद्धिक और राजनीतिक क्षेत्रों में बहस जारी है।